इस थप्पड़ की गूंज तुम्हें मरते दम तक सुनाई देगी,यह डायलॉग है तो  बॉलीवुड की 1986 में आई फिल्म कर्मा का,लेकिन गुलाबीनगर जयपुर में  कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके को एक युवक के थप्पड़ की गूंज राजनीतिक गलियारों में दूर तक सुनाई देगी...इन दिनों दीपके दिल्ली के जंतर मंतर में जेन जी के साथ मिलकर प्रदर्शन के साथ...देश भर में इस तरह के प्रदर्शन कर रहे हैं...हालांकि सैद्धांतिक रुप से वे शिक्षा व्यवस्था में सुधार की बात कहते हुए युवाओं को सड़क पर उतर कर विरोध जताने का प्रयास कर रहे हैं...लेकिन व्यावहारिक रुप से वे...युवाओं की उम्मीदों और अपेक्षाओं की लहरों पर सवार होकर बांग्लादेश और नेपाल जैसा माहौल बनाकर...राजनीतिक व्यवस्था बदलाव में अपनी भूमिका को तलाश रहे हैं...बात छोटी सी थी, लेकिन थी गंभीर,मगर उस गंभीरता में भी अभिजीत दीपके ने आपदा में अवसर को तलाश लिया और तुरंत युवाओं की भावनाओं से सराबोर एक मसले को आंदोलन का रुप देकर अपने सोए हुए ख्वाबों को हकीकत में ढ़ालने लग गए...अमेरिका में रहने वाले अभिजीत दीपके ने सीजेआई सूर्यकांत की एक टिप्पणी को अपना हथियार बनाया और युवाओं के गुस्से को अपनी राजनीतिक आशाओं की ढाल बनाया...कोई उनके आंदोलन को शिक्षा जगत में व्याप्त विसंगतियों को युवाओं का विरोध बताता है, कुछ हद तक सही है, लेकिन दीपके की सोई हुई राजनीतिक महत्वाकांक्षा का जागना भी इसका दूसरा पक्ष है, जो हो सकता है 2020 से 2023 के बीच में जगी हो...उस दौर में वे आम आदमी पार्टी के सामाजिक माध्यम दल के साथ...एक स्वयंसेवक के रूप में सामने आए थे...2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के समय, अरविन्द केजरीवाल के साथ मिलकर युवाओं तक पहुंच के साथ राजनीतिक संदेश पहुंचाने में भूमिका निभाई थी...केजरीवाल के राजनीतिक सफर के सहयोगी के रुप में , उन्होंने यह तो जान लिया कि, राजनीतिक सफर युवाओं की भावनाओं, उनके मसलों के साथ आसानी से किया जा सकता है...और अगर इसमें तीखे तेवर का तड़का लग जाता है तो रास्ता और आसान हो जाता है...
दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को भी सार्वजनिक रैलियों और रोड शो के दौरान कई बार इस तरह की घटनाओं से दो चार होना पड़ा था, जब सार्वजनिक रुप से उनके साथ अभद्र घटनाएं हुईं...थप्पड़ मारे जाने की घटनाएं सामने आईं...मई 2019 में दिल्ली के मोती नगर इलाके में... एक रोड शो के दौरान खुली जीप पर सवार अरविंद केजरीवाल को सुरेश चौहान नाम के व्यक्ति ने थप्पड़ मार दिया था...इस घटना के बाद आम आदमी पार्टी ने इसे भाजपा की साजिश बताया था...अप्रैल 2014 को सुल्तानपुरी में चुनाव प्रचार के दौरान... एक ऑटो-रिक्शा चालक ने पहले उन्हें माला पहनाई... और फिर अचानक उन्हें थप्पड़ मार दिया था...केजरीवाल पर हुए इन हमलों, जिनमें मिर्च पाउडर फेंकना और स्याही डालना भी शामिल है, के बाद राजनीतिक दलों और मीडिया में काफी तीखी बहस और आरोप-प्रत्यारोप हुए हैं...हालांकि इस तरह की घटनाओं को स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था में कभी भी उचित नहीं माना जा सकता...आजकल थप्पड़ की राजनीति का अर्थ चुनावी भाषणों और वैचारिक बहसों से आगे बढ़कर... सार्वजनिक रूप से विरोध दर्ज कराने या हिंसक प्रतिक्रिया देने की घटनाओं से है, जो अक्सर हर किसी का ध्यान खींचने का माध्यम बन जाती हैं...गुलाबीनगर जयपुर में हाल ही में शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन के दौरान...अभिजीत दीपके को एक युवक ने थप्पड़ मार दिया था... इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ और इसे लेकर तीखी सियासी बयानबाज़ी और बहस छिड़ गई...भारतीय राजनीति में थप्पड़ कांड वैचारिक असहमति और विरोध को जायज नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन कई मौकों पर नेताओं पर शारीरिक हमले या तो हुए हैं या उन्होंने खुद ऐसे हथकंडे अपनाए हैं...अब चाहे इस तरह के व्यवहार को लोकतंत्र के लिए खतरा माना जाए या फिर विचारधारा या बयानों को घटना का कारण, इस तरह के मामलों को अक्सर सहानुभूति हासिल करने या रातों-रात राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आने के माध्यम के रूप में भी देखा जाता है...
एक समय था जब असहमति प्रकट करने के लिए लोग लेख लिखते थे, पुस्तकें प्रकाशित करते थे, सभाएँ करते थे, जुलूस निकालते थे और बहसों में भाग लेते थे, अब उसकी जगह पांच उंगलियों से समझाया जाना आसान लगने लगा है...इसमें तर्क और संवाद की जरुरत नहीं होती, एक मोबाइल या कैमरा अपना काम कर देता है...राजनीति में तर्क के हारने और हथेली के जीतने का बवंडर शांति से पहले का तूफान है या फिर तूफान से पहले की शांति...गुलाबी नगर जयपुर में हुई इस घटना को आसानी से समझा जा सकता है...क्षणिक उत्तेजना से ऊपर उठकर संवाद, शालीनता और वैचारिक साहस को लोकतांत्रिक औज़ार बनाया जाए तो दिक्कतें खुद ही दूर होती चली जाएगी...
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