बदलते मौसम और मानसून की अनिश्चितता के बीच छिंदवाड़ा जिले के किसानों ने खेती का नया तरीका अपनाया है। कम बारिश के कारण खेतों में नमी कम होने और सोयाबीन की कटाई के बाद अगली फसल की बुवाई को लेकर बनी चिंता के बीच 'जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम' किसानों के लिए मददगार साबित हो रहा है।
मध्य प्रदेश सरकार के कृषि विभाग, बोरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया (BISA) और सिमिट (CIMMYT) के संयुक्त सहयोग से यह परियोजना वर्ष 2024 से संचालित की जा रही है। इसके जरिए किसानों को कम पानी और सीमित संसाधनों में खेती करने की आधुनिक तकनीक सिखाई जा रही है।
चारगांव करबल में जीरो टिलेज तकनीक से बुवाई
मोहखेड़ विकासखंड के ग्राम चारगांव करबल में किसान बिना खेत की जुताई किए सीधे चने की बुवाई कर रहे हैं। इसे जीरो टिलेज तकनीक कहा जाता है, जिसमें पारंपरिक जुताई की प्रक्रिया को पूरी तरह छोड़ दिया जाता है।
इस पद्धति में खेत में पहले से मौजूद नमी को सुरक्षित रखा जाता है। BISA की ओर से किसानों को विशेष सीडर मशीन उपलब्ध कराई गई है, जिससे बड़े रकबे में कम समय और कम लागत में बुवाई का काम पूरा किया जा रहा है।
लागत और समय की बड़ी बचत
पारंपरिक खेती में जुताई, पाटा लगाने और सिंचाई पर भारी खर्च होता है। वहीं, इस नई तकनीक से डीजल, समय और जुताई की लागत तीनों की बचत हो रही है।
BISA जबलपुर के तकनीकी विशेषज्ञ दीपेंद्र सिंह के मुताबिक, परियोजना की शुरुआत में किसानों को बिना जुताई के खेती करने के तरीके पर संदेह था। हालांकि, लगातार प्रदर्शन और क्षेत्र में किए गए प्रयोगों के बाद अब किसान इस तकनीक को खुद समझ रहे हैं और बड़े पैमाने पर अपनाने लगे हैं।
बदलते मौसम में टिकाऊ खेती का विकल्प
कम नमी वाली परिस्थितियों में यह तरीका फसल उत्पादन को सुरक्षित रखने में कारगर साबित हो रहा है। चारगांव करबल के किसानों का इस आधुनिक पद्धति की ओर रुझान इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में यह तकनीक जल संकट वाले इलाकों में टिकाऊ कृषि का मुख्य आधार बन सकती है।
