राजस्थान के 409 औद्योगिक क्षेत्रों में बिना अनुमति चल रहे भूजल दोहन पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने बड़ा कदम उठाया है। एनजीटी की सेंट्रल जोन पीठ, भोपाल ने आदेश दिया है कि केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (सीजीडब्ल्यूए) की एनओसी के बिना रीको या कोई भी औद्योगिक इकाई जमीन से पानी नहीं निकाल सकेगी। पीठ ने राज्य के सभी जिला कलेक्टरों को तुरंत अवैध बोरवेल सील करने, बिजली कनेक्शन काटने और पर्यावरण क्षतिपूर्ति के लिए भारी जुर्माना वसूलने के निर्देश दिए हैं।
यह फैसला बीकानेर निवासी ताहिर हुसैन की याचिका पर जस्टिस शिव कुमार सिंह और एक्सपर्ट मेंबर सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने सुनाया है। अदालत ने पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा उठाने के लिए रीको पर 50,000 रुपये की कॉस्ट भी लगाई है, जो याचिकाकर्ता को 30 दिनों के भीतर चुकानी होगी। इस आदेश के बाद रीको बीकानेर में बीछवाल के चार और नापासर औद्योगिक क्षेत्र का एक ट्यूबवेल सीज किया जाएगा। रिकॉर्ड के मुताबिक, पिछले आठ साल में रीको बीकानेर में 28.30 करोड़ और पूरे प्रदेश में 180 करोड़ रुपये का पानी बिना अनुमति बेच चुका है।
कलेक्टरों को मिले कार्रवाई के अधिकार
एनजीटी ने जिला कलेक्टरों और एसडीएम को अधिकृत अधिकारी बनाते हुए अवैध बोरवेल सील करने, बिजली आपूर्ति काटने और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत केस दर्ज करने के निर्देश दिए हैं। बिना एनओसी के भूजल निकालने वाली सभी इकाइयों से जल निकासी की तिथि से सीपीसीबी के तय फॉर्मूले के आधार पर हर्जाना वसूला जाएगा। जिन इकाइयों ने एनओसी के लिए आवेदन ही नहीं किया है, उन्हें तत्काल बंद कराया जाएगा। साथ ही, रीको और सभी उपभोक्ता इकाइयों को अपने बोरवेलों पर छेड़छाड़-मुक्त डिजिटल फ्लो मीटर और टेलीमेट्री सिस्टम लगाने होंगे।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि रीको और उद्योगों से सीजीडब्ल्यूए द्वारा एकत्रित शुल्क और जुर्माने की राशि का उपयोग उसी जिले में भूजल रीचार्ज इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में किया जाए ताकि भूजल स्टॉक का नेट लॉस न हो। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत बिना सीजीडब्ल्यूए की पूर्व अनुमति के श्रमिकों के घरेलू उपयोग के लिए भी भूजल आपूर्ति नहीं की जा सकेगी।
मरुधरा में भूजल का 'रेड अलर्ट'
जल शक्ति मंत्रालय और सीजीडब्ल्यूबी की 'डायनामिक ग्राउंड वाटर रिसोर्सेज रिपोर्ट' के अनुसार, राज्य में भूजल निष्कर्षण दर 150.22 प्रतिशत है, यानी 100 लीटर रीचार्ज पर 150 लीटर पानी निकाला जा रहा है। बारिश से जमीन के भीतर जितना पानी रीचार्ज होता है (11,07,363.40 हेक्टेयर मीटर), उससे डेढ़ गुना अधिक यानी 16,63,472.31 हेक्टेयर मीटर पानी बाहर निकाला जा रहा है।
प्रदेश के 295 में से 203 ब्लॉक (68.8 प्रतिशत) अति-दोहित श्रेणी यानी रेड जोन में हैं। 23 ब्लॉक गंभीर संकट में और 29 ब्लॉक अर्ध-गंभीर स्थिति में हैं, जबकि केवल 37 ब्लॉक सुरक्षित बचे हैं। जयपुर, अजमेर, अलवर, भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, दौसा, झुंझुनूं और सवाई माधोपुर के सभी ब्लॉक 100 प्रतिशत रेड जोन में शामिल हैं। भूजल का 85 से 90 प्रतिशत हिस्सा कृषि में और 5 प्रतिशत उद्योगों में उपयोग होता है, लेकिन अनियंत्रित औद्योगिक दोहन से पानी में फ्लोराइड, नाइट्रेट, टीडीएस और आर्सेनिक की मात्रा खतरनाक स्तर तक बढ़ गई है। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, जल गुणवत्ता सूचकांक में भारत 122 देशों में 120वें स्थान पर है।
जल संचयन और कृषि नीति में बदलाव के निर्देश
एनजीटी ने राज्य के पर्यावरण विभाग को एनीकट, चेक-डैम, कंटूर ट्रेंच, इंजेक्शन वेल, पीजोमीटर और अनिवार्य रूफटॉप रेन वॉटर हार्वेस्टिंग का निर्माण सुनिश्चित करने को कहा है। इसके साथ ही जोहड़ों की गाद निकालने, ऐतिहासिक बावड़ियों का जीर्णोद्धार और टांकों के पायतान साफ कर चरणबद्ध तरीके से जल संचयन करने के निर्देश दिए गए हैं। कृषि क्षेत्र में फव्वारा व बूंद-बूंद सिंचाई पर सब्सिडी बढ़ाने और अधिक पानी वाली फसलों की जगह बाजरा, ज्वार, दालों व तिलहन को बढ़ावा देने की बात कही गई है।
