रायसेन जिले के प्रमुख जलाशयों में इस बार पानी का स्तर उम्मीद से काफी कम दर्ज किया गया है। कम बारिश के चलते जिले के सबसे बड़े बारना बांध समेत अन्य जल स्रोतों में स्टोरेज कम है, जिससे रबी सीजन में किसानों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। गेहूं और चने की फसलों को बचाने के लिए जरूरी सिंचाई के रकबे को लेकर चिंता जताई जा रही है।
बारना बांध से रायसेन, उदयपुरा और सीहोर जिले की बुधनी विधानसभा क्षेत्र के किसान जुड़े हुए हैं। इस मुख्य जलाशय से लगभग 80 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि सिंचित होती है। सामान्य दिनों में रबी की फसलों को 4 से 5 पानी की जरूरत होती है, लेकिन इस बार कम जलसंग्रह के कारण नहरों के अंतिम छोर तक पर्याप्त पानी पहुंचाना प्रशासन और जल संसाधन विभाग के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। स्थिति को देखते हुए आशंका जताई जा रही है कि किसानों को 2 से 3 सिंचाई तक ही सीमित रहना पड़ सकता है।
कम जलस्तर और पेयजल संकट की आहट
सिंचाई के साथ-साथ गर्मियों के दिनों में पेयजल की उपलब्धता पर भी असर पड़ने की पूरी आशंका है। बारना बांध और दाहोद डेम पर रायसेन शहर के अलावा बाड़ी, मंडीदीप, औबेदुल्लागंज और आसपास के ग्रामीण इलाके पीने के पानी के लिए निर्भर हैं। जलस्तर घटने से आने वाले महीनों में इन क्षेत्रों में जलापूर्ति बनाए रखने के लिए अभी से प्रबंधन पर जोर देना होगा।
जल संसाधन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, इस साल मानसूनी बारिश का कोटा पूरा न होने से बांधों का पेट नहीं भर पाया। बारना बांध में जलस्तर मात्र 19.61 प्रतिशत और दाहोद डेम में 33.61 प्रतिशत पर पहुंच गया है। पानी की इस कमी से किसानों की चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं।
किसानों का पक्ष और प्रशासनिक तैयारी
स्थानीय किसानों का कहना है कि यदि समय पर नहरों से पानी नहीं छोड़ा गया या वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई, तो उनकी लागत निकालना भी मुश्किल हो जाएगा। युवा किसानों के अनुसार, फसल की इस नाजुक अवस्था में पानी न मिलने से पैदावार पर सीधा असर पड़ेगा।
बारना बांध के एसडीओ विकास अमवानी ने बताया कि जलाशयों में उपलब्ध जल का वैज्ञानिक और संतुलित उपयोग सुनिश्चित किया जा रहा है ताकि सिंचाई और पेयजल दोनों की जरूरतों के बीच संतुलन बनाया जा सके। विभाग की प्राथमिकता यह है कि सीमित जलसंसाधन के बावजूद नहरों के जरिए टेल एंड (अंतिम छोर) तक पानी की एक-एक बूंद पहुंचाई जा सके।
