राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर नए सियासी समीकरणों और तीसरे मोर्चे की अटकलें तेज हो गई हैं। किसान आंदोलन के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत कर रहे युवा नेता नरेश मीणा को शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी का समर्थन मिलने के बाद यह सुगबुगाहट शुरू हुई है। वहीं, डीडवाना विधायक यूनुस खान के साथ भाटी की हालिया मुलाकात ने इन चर्चाओं को और हवा दे दी है।
भाटी-मीणा की बढ़ती नजदीकियां और राजनीतिक मायने
टोंक जिले के समरावता प्रकरण और एसडीएम को थप्पड़ मारने की घटना के बाद नरेश मीणा को प्रदेशव्यापी पहचान मिली। जेल से रिहाई के बाद विरोध प्रदर्शनों और किसान-युवा मुद्दों पर उनकी सक्रियता लगातार जारी है। हाल ही में उनके अनशन को शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने जूस पिलाकर समाप्त करवाया था।
यह मुलाकात सिर्फ एक आंदोलन के समर्थन तक सीमित नहीं मानी जा रही है। पूर्व मंत्री राजेंद्र सिंह गुढ़ा पहले से ही नरेश मीणा के समर्थन में खड़े हैं। ऐसे में असंतुष्ट और युवा नेताओं के एक मंच पर आने की चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है।
रविंद्र सिंह भाटी और यूनुस खान की भूमिका
रविंद्र सिंह भाटी ने 2023 के विधानसभा चुनाव में शिव सीट से निर्दलीय उतरकर जीत दर्ज की थी। इसके बाद लोकसभा चुनाव 2024 में बाड़मेर-जैसलमेर सीट से निर्दलीय मैदान में उतरकर उन्होंने त्रिकोणीय मुकाबला बना दिया था और भाजपा उम्मीदवार कैलाश चौधरी को तीसरे स्थान पर धकेल दिया था। ओरण संरक्षण और ईडब्ल्यूएस प्रावधानों के सरलीकरण जैसे मुद्दों पर उनकी सक्रियता युवाओं के बीच उन्हें अलग पहचान देती है।
दूसरी ओर, डीडवाना विधायक यूनुस खान से भाटी की मुलाकात ने संभावित राजनीतिक गठजोड़ के कयासों को नया आधार दिया है। यूनुस खान वसुंधरा सरकार में मंत्री रह चुके हैं और राज्य की राजनीति में स्वतंत्र प्रभाव रखते हैं। यदि भाटी, नरेश मीणा और यूनुस खान किसी साझा मंच पर आते हैं, तो यह प्रदेश की राजनीति में एक नया विकल्प बन सकता है। हालांकि, दोनों पक्षों की ओर से अभी तक किसी औपचारिक तीसरे मोर्चे का ऐलान नहीं किया गया है।
तीसरे मोर्चे की राह में चुनौतियां और BAP का प्रभाव
प्रदेश में तीसरे विकल्प की चर्चा के बीच भारत आदिवासी पार्टी (BAP) की मौजूदगी भी अहम है। सांसद राजकुमार रोत के नेतृत्व में पार्टी ने आदिवासी अंचल में पारंपरिक दलों के सामने चुनौती पेश की है। यदि कोई नया युवा समूह आकार लेता है, तो उसे BAP के साथ तालमेल, क्षेत्रीय मुद्दों और सामाजिक समीकरणों को साधना होगा।
राजस्थान में तीसरे मोर्चे के प्रयास पहले भी हुए हैं, लेकिन नेतृत्व की खींचतान और वोटों के बिखराव के कारण वे परवान नहीं चढ़ सके। जानकारों का मानना है कि केवल मुलाकातों के आधार पर किसी गठजोड़ का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। नए समीकरणों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ये नेता अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता को साझा एजेंडे और मजबूत संगठन में बदल पाते हैं या नहीं।
