Friday, 16 October 2026
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शारदीय नवरात्रि 2026: तिथियां और मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए करें अर्गला स्तोत्र का पाठ

संक्षेप में

शारदीय नवरात्रि 2026 का पर्व 11 अक्टूबर से 19 अक्टूबर तक मनाया जाएगा। इस दौरान दुर्गा सप्तशती के साथ अर्गला स्तोत्र का पाठ करने से मां दुर्गा की कृपा, सुख-समृद्धि और शत्रुओं पर विजय का आशीर्वाद मिलता है।

मुख्य बातें

  • शारदीय नवरात्रि 2026 की तिथि 11 अक्टूबर से 19 अक्टूबर तक है
  • अर्गला स्तोत्र महर्षि मार्कण्डेय द्वारा रचित माना जाता है
  • यह पाठ दुर्गा सप्तशती पाठ का एक महत्वपूर्ण अंग है
धर्म
शारदीय नवरात्रि 2026: तिथियां और मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए करें अर्गला स्तोत्र का पाठ

हिन्दू पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से नवमी तक शारदीय नवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। इस बार शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से 19 अक्टूबर 2026 तक है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा की जाती है। व्रत रखने के साथ ही साधक विभिन्न स्तोत्रों और मंत्रों का पाठ कर मां का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। दुर्गा सप्तशती के पाठ के साथ अर्गला स्तोत्र का पाठ करना बेहद फलदायी माना जाता है।

कब से शुरू है शारदीय नवरात्रि 2026?

पंचांग गणना के मुताबिक, इस वर्ष शारदीय नवरात्रि का पर्व 11 अक्टूबर 2026 को कलश स्थापना के साथ आरंभ होगा और इसका समापन 19 अक्टूबर 2026 को महानवमी के साथ होगा। इन नौ दिनों में माता के दरबार में भक्तों का तांता लगा रहता है और हर कोई मां की कृपा पाने के लिए साधना में लीन रहता है।

अर्गला स्तोत्र का धार्मिक महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि के दिनों में अर्गला स्तोत्र का पाठ करने से जीवन की कई बाधाएं दूर होती हैं और कार्यों में सफलता मिलती है। इस स्तोत्र के माध्यम से साधक मां दुर्गा से रूप, जय, यश और शत्रुओं पर विजय की कामना करता है। नियमित रूप से इस पाठ को करने से मन में सकारात्मकता और आत्मविश्वास का संचार होता है।

संपूर्ण अर्गला स्तोत्र पाठ

अथार्गलास्तोत्रम्

ॐ अस्य श्रीअर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः।

ॐ नमश्चण्डिकायै

मार्कण्डेय उवाच

ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥1॥

जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि। जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥2॥

मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नमः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥3॥

महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥4॥

रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥5॥

शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥6॥

वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥7॥

अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥8॥

नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥9॥

स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥10॥

चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥11॥

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥12॥

विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥13॥

विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥14॥

सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥15॥

विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥16॥

प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥17॥

चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥18॥

कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥19॥

हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥20॥

इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥21॥

देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥22॥

देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥23॥

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्। तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥24॥

इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः। स तु सप्तशतीसङ्ख्यावरमाप्नोति सम्पदाम्॥25॥

इति देव्या अर्गलास्तोत्रं सम्पूर्णम्।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

शारदीय नवरात्रि 2026 कब से कब तक है?

शारदीय नवरात्रि 2026 की शुरुआत 11 अक्टूबर से होगी और इसका समापन 19 अक्टूबर 2026 को महानवमी के दिन होगा।

अर्गला स्तोत्र का पाठ करने से क्या लाभ मिलता है?

अर्गला स्तोत्र का नियमित पाठ करने से मां दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है, कार्यों की बाधाएं दूर होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि व आत्मविश्वास बढ़ता है।

अर्गला स्तोत्र का पाठ किस पूजा के दौरान किया जाता है?

अर्गला स्तोत्र का पाठ मुख्य रूप से शारदीय और चैत्र नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती के पाठ के साथ करना विशेष फलदायी माना जाता है।