राजस्थान के सीकर जिले में स्थित जीण माता मंदिर अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक मान्यताओं के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। अरावली पर्वतमाला की तीन पहाड़ियों के बीच बसे इस मंदिर में हजारों वर्षों से अखंड ज्योति जल रही है। नवरात्रि के इन दिनों में यहां देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
औरंगजेब का आक्रमण और भौरों का चमत्कार
इतिहास और जनश्रुतियों के मुताबिक, मुगल बादशाह औरंगजेब के शासनकाल में जब उसकी सेना ने शेखावाटी क्षेत्र के मंदिरों को निशाना बनाना शुरू किया, तब जीण माता के भक्तों ने मां से रक्षा की गुहार लगाई थी।
मंदिर के पुजारी भवानी शंकर ने बताया कि माता के चमत्कार से सैनिकों पर मधुमक्खियों (भौरों) का एक विशाल झुंड टूट पड़ा था। इस हमले से परेशान होकर औरंगजेब की सेना को पीछे हटना पड़ा था। इस घटना के बाद जीण माता को 'भौरों वाली देवी' के रूप में भी पूजा जाने लगा।
महारानी और माता के इस चमत्कार से प्रभावित होकर मुगल बादशाह ने मंदिर में अखंड ज्योति के लिए दिल्ली दरबार से तेल भेजने का वादा किया था। इसके अलावा, औरंगजेब ने मंदिर में चांदी का छत्र चढ़ाया और पूजा-सेवा के लिए एक मुस्लिम परिवार को नियुक्त किया था। इस परिवार के वंशज आज भी मंदिर परिसर की सीढ़ियों को धोने की सेवा निभाते हैं।
जयपुर राजघराने और देवस्थान विभाग की परंपरा
समय के साथ तेल भेजने की व्यवस्था में बदलाव आया। दिल्ली दरबार के बाद जयपुर राजघराने ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। वर्तमान में राजस्थान सरकार का देवस्थान विभाग जीण माता के दरबार में जलने वाली अखंड ज्योति के लिए तेल के अनुदान की परंपरा का निर्वहन कर रहा है।
भाई-बहन के स्नेह की पौराणिक कथा
लोक मान्यताओं के अनुसार, जीण माता का जन्म चूरू जिले के घांघू गांव के चौहान राजवंश में राजा घांघू सिंह के घर हुआ था। एक कथा के अनुसार, पानी भरने जाने के दौरान जीण माता और उनकी भाभी के बीच इस बात को लेकर विवाद हो गया था कि भाई हर्ष किसे अधिक स्नेह करता है।
घर लौटने पर भाई ने सबसे पहले अपनी पत्नी (भाभी) का मटका उतारा, जिससे नाराज होकर जीण माता सीकर के पास अरावली की पहाड़ियों पर चली गईं। बहन को मनाने के लिए उनके भाई हर्ष भी वहां पहुंचे, लेकिन जीण के वापस लौटने से इनकार करने पर हर्ष ने भी वहीं पास की पहाड़ी पर भैरव की तपस्या शुरू कर दी।
आज जीण माता का प्राचीन मंदिर जीणमाता गांव में स्थित है, जबकि उनके भाई हर्ष का मंदिर कुछ ही दूरी पर 'हर्षनाथ' के नाम से अरावली की पहाड़ियों पर बना हुआ है। यह मंदिर भाई-बहन के असीम प्रेम का प्रतीक माना जाता है।
नवरात्रि मेला और श्रद्धालुओं की मान्यता
शारदीय और चैत्र नवरात्रि के दौरान सीकर जिले के इस धाम पर भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। मान्यता है कि यहां दर्शन मात्र से कई तरह के चर्म रोगों में आराम मिलता है।
अपनी मन्नत पूरी होने पर भक्त सिर पर जलते कोयले की सिगड़ी रखकर या पैदल ध्वज लेकर धाम तक पहुंचते हैं। इसके अलावा, नवविवाहित जोड़े और परिवारों द्वारा बच्चों के मुंडन संस्कार के लिए भी इस मंदिर में भारी भीड़ जुटती है।
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