देशभर में लगातार बढ़ रहे 'डिजिटल अरेस्ट' के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि लगातार मीडिया रिपोर्ट्स और जागरूकता अभियानों के बावजूद पढ़े-लिखे लोग भी इन साइबर घोटालों का शिकार हो रहे हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वित्तीय धोखाधड़ी रोकने के लिए केवल घटना के बाद रिपोर्ट दर्ज करना काफी नहीं है, बल्कि बैंकों को पहले से पुख्ता इंतजाम करने होंगे।
CJI की दोूक- "मोबाइल को दीवार पर मारें, गिरफ्तारी खत्म हो जाएगी"
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने इस तरह की ठगी के तौर-तरीकों पर हैरानी जताई। उन्होंने कहा कि लोग यह क्यों नहीं समझ पा रहे हैं कि डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई व्यवस्था कानून में है ही नहीं।
CJI ने कहा- "हम हैरान हैं कि लोग समझ क्यों नहीं रहे हैं? पीड़ितों के साथ क्या गलत है? क्या वे सामान्य लोग नहीं हैं? ये बात मीडिया में हर जगह है। अगर आपको लगता है कि आप मोबाइल पर अरेस्ट हो रहे हैं तो मोबाइल को दीवार पर मारें और गिरफ्तारी खत्म हो जाएगी।"
अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी के डर और मानसिक दबाव में आकर लोग अपनी जीवनभर की जमा-पूंजी ठगों के हवाले कर रहे हैं। एमिकस क्यूरी और सीनियर एडवोकेट एनएस नप्पिनई ने कोर्ट को बताया कि हाल ही में एक महिला से इसी तरह डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 2.5 करोड़ रुपये ठग लिए गए।
2026 में 22 हजार से ज्यादा मामले, पिछले साल ठगे गए थे 1211 करोड़
साइबर ठगी के आंकड़े डराने वाले हैं। साल 2026 में देश भर में डिजिटल अरेस्ट के 22 हजार से ज्यादा मामले दर्ज किए जा चुके हैं, जिनमें साइबर अपराधियों ने लोगों से 800 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी की है। इससे पहले 2025 में ऐसे 58,239 केस सामने आए थे और लगभग 1211 करोड़ रुपये की रकम ठगी गई थी।
यह पूरा मामला गौरव कुमार साहा और निधि भंडारी की याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया है। याचिकाकर्ताओं ने 12 राज्यों में दर्ज 35 साइबर अपराध मामलों को एक जगह ट्रांसफर करने की मांग की थी। उन पर आरोप है कि उनकी कंपनी के बैंक खातों का इस्तेमाल ठगी की रकम जमा करने और आगे ट्रांसफर करने के लिए हुआ था। हालांकि, याचिकाकर्ताओं का दावा है कि उनकी जानकारी के बिना खातों का दुरुपयोग किया गया और वे खुद इस ठगी का शिकार हैं।
बैंक की लापरवाही पर मुआवजे का प्रस्ताव और RBI को निर्देश
अदालत ने साइबर धोखाधड़ी को रोकने के लिए व्यवस्थागत बदलावों पर जोर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को कुछ अहम निर्देश दिए हैं और नए प्रस्ताव रखे हैं:
- बैंकों की जवाबदेही: अगर बैंक की लापरवाही के कारण साइबर ठगी होती है, तो बैंक पीड़ित को मुआवजा दें और जिम्मेदारी तय होने पर कार्रवाई का सामना करें। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यह फिलहाल एक प्रस्ताव है, अंतिम आदेश नहीं।
- संदिग्ध ट्रांजैक्शन पर रोक: खातों में असामान्य लेन-देन होने पर बैंक उसे वेरिफाई करने तक अस्थायी रूप से क्यों नहीं रोक सकते? कोर्ट ने कहा कि ऐसे संदिग्ध ट्रांजैक्शन की जांच होनी चाहिए और इसकी जानकारी तुरंत स्थानीय पुलिस को दी जानी चाहिए।
- RBI के निर्देश: सुप्रीम कोर्ट ने RBI से प्रस्तावित KYC संशोधन निर्देश, 2026 की समीक्षा करने और सभी अधिकृत वित्तीय संस्थानों की सूची पेश करने को कहा है। साथ ही, वित्तीय संस्थान जरूरी सावधानी बरतने में विफल रहते हैं तो पीड़ितों को मुआवजा देने का प्रावधान होना चाहिए।
पहले भी आ चुके हैं कड़े निर्देश
इससे पहले 28 अक्टूबर को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट के जरिए होने वाली साइबर ठगी को 'डिजिटल डकैती' करार दिया था। बेंच ने कहा था कि यह सामान्य जबरन वसूली से ज्यादा गंभीर अपराध है, जिसमें खासकर बुजुर्गों को वीडियो कॉल के जरिए निशाना बनाया जा रहा है। कोर्ट ने यह भी साफ किया था कि आरोपियों की सुविधा के लिए पीड़ितों को दिल्ली नहीं बुलाया जा सकता और अलग-अलग राज्यों में चल रही पुलिस जांच में दखल नहीं दिया जाएगा।
वहीं, 28 जुलाई को CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने केंद्र सरकार से डिजिटल अरेस्ट को आपराधिक कानून में एक अलग अपराध घोषित करने और इसके लिए कड़ी सजा का प्रावधान करने पर विचार करने को कहा था। अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि ठोस सबूत मिलने पर आरोपियों की अवैध संपत्ति तुरंत फ्रीज की जानी चाहिए।
