उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रविवार को लखनऊ में देश की एकता और सामाजिक सद्भाव पर जोर देते हुए तीखा बयान दिया। उन्होंने कहा कि जाति और क्षेत्र के नाम पर समाज को बांटने वाली ताकतें राष्ट्र के प्रति अपराध कर रही हैं और इनसे मुकाबला करने में शिक्षकों की भूमिका सबसे अहम है।
"बंटा हुआ भारत पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धा नहीं"
राजधानी के आशियाना स्थित डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के डॉ. भीमराव आंबेडकर प्रेक्षागृह में यह आयोजन हुआ। अखिल विश्व गायत्री परिवार की प्रांतीय शिक्षक गरिमा कार्यशाला में बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे सीएम योगी ने अपने संबोधन में देश की वैचारिक स्थिति पर गंभीर चिंता जताई।
मुख्यमंत्री ने कहा- "हम कैसा भारत चाहते हैं? बिखरा हुआ भारत, बंटा हुआ भारत? जातीय खेमों में आपस में लड़ता हुआ भारत? याद रखना, अगर आप ऐसे भारत की कल्पना करते हैं तो हम अपने पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धा नहीं रखते हैं।"
उन्होंने आगे कहा कि देश को 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' के रूप में देखना और गढ़ना हर नागरिक की सामूहिक जिम्मेदारी है। गुलामी के दौर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि तब भी एक ऐसा वर्ग सक्रिय था जो समाज को खंडित करने का काम कर रहा था, और आज भी कुछ तत्व वही पुराना एजेंडा चला रहे हैं।
राष्ट्रमाता और भारत माता के प्रति अपराध
मुख्यमंत्री ने विभाजनकारी ताकतों पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि समाज को जातियों और क्षेत्रों के सांचे में बांटना सीधे तौर पर राष्ट्रमाता और भारत माता के साथ-साथ पूर्वजों के प्रति भी गंभीर अपराध है। यह कृत्य देश की स्वाधीनता को एक बार फिर संकट में धकेलने जैसा है।
उन्होंने शिक्षकों को संबोधित करते हुए कहा कि जब भी देश के सामने इस तरह की विभाजनकारी चुनौतियां सिर उठाती हैं, तब शिक्षण संस्थानों और गुरुओं का दायित्व कई गुना बढ़ जाता है। समाज के इन तत्वों को किसी भी कीमत पर कामयाब नहीं होने देना चाहिए।
गायत्री परिवार के कार्यक्रम में हुआ सम्मान
रविवार को आयोजित इस कार्यशाला में गायत्री परिवार के युवा प्रमुख चिन्मय पंड्या ने कलश (लोटा) और माला भेंट कर मुख्यमंत्री का स्वागत किया। इस दौरान मुख्यमंत्री ने शैक्षणिक उत्कृष्टता और सहगामी गतिविधियों में बेहतर प्रदर्शन करने वाले 10 अलग-अलग स्कूलों के मेधावी बच्चों को मंच पर सम्मानित भी किया।
इस अवसर पर बोलते हुए डॉ. चिन्मय पंड्या ने आज की पीढ़ी की मानसिक स्थिति और बदलती प्राथमिकताओं पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि स्वार्थ और संकीर्णता आज समाज में एक चलन बन गए हैं, जबकि धर्म, न्याय, नीति और सदाचार जैसे मूल्य अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं।
डॉ. पंड्या के मुताबिक, आज के समाज में लोगों की मानसिकता तुरंत और हर कीमत पर अपनी इच्छा पूरी करने की हो गई है, भले ही इसके लिए दूसरों का नुकसान ही क्यों न करना पड़े। व्यक्ति के पास आज भौतिक सुख-सुविधाएं और धन प्रचुर मात्रा में है, लेकिन इसके साथ ही उसके जीवन में तनाव, बेचैनी और भीतर का खोखलापन भी लगातार गहराता जा रहा है।
