केंद्र सरकार ने 16वें वित्त आयोग के तहत ग्रामीण स्थानीय निकायों (RLBs) के लिए 4.35 लाख करोड़ रुपये के अनुदान के कार्यान्वयन हेतु परिचालन दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। यह नया ढांचा 2026-31 की अवधि के लिए लागू होगा, जिसका मुख्य उद्देश्य पंचायतों में वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित करना और सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार लाना है।
2.62 लाख पंचायतों को होगा लाभ नए दिशा-निर्देश देश भर की 2.62 लाख पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) पर लागू होंगे। सरकार का लक्ष्य इन निधियों के माध्यम से ग्रामीण बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य और विकास कार्यों को स्थानीय स्तर पर गति देना है। इस पूरी राशि को दो मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है। कुल आवंटन का 80% यानी 3.48 लाख करोड़ रुपये 'बेसिक ग्रांट' के रूप में दिए जाएंगे, जो पंचायतों की दैनिक जरूरतों और बुनियादी सेवाओं के लिए होंगे। शेष 20% यानी 87,048 करोड़ रुपये 'परफॉर्मेंस ग्रांट' के तौर पर रखे गए हैं, जो वित्तीय प्रबंधन और सेवा वितरण में बेहतर प्रदर्शन करने वाली पंचायतों को प्रोत्साहित करेंगे।
टाइड और अनटाइड फंड का गणित बेसिक ग्रांट को दो बराबर हिस्सों में बांटा गया है। इसमें 50% राशि 'टाइड ग्रांट' होगी, जिसे अनिवार्य रूप से स्वच्छता, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और जल प्रबंधन जैसे कार्यों पर खर्च करना होगा। शेष 50% 'अनटाइड ग्रांट' होगी, जिसके उपयोग में पंचायतों को लचीलापन दिया गया है। इस राशि को संविधान की 11वीं अनुसूची में शामिल 29 विषयों, जैसे कृषि, ग्रामीण आवास, सड़क और शिक्षा पर स्थानीय प्राथमिकताओं के आधार पर खर्च किया जा सकेगा।
राज्यों के लिए शर्तें और आवंटन का आधार अनुदान जारी करने के लिए केंद्र ने राज्यों के सामने कुछ सख्त शर्तें रखी हैं। अनुदान पाने के लिए राज्यों को स्थानीय निकायों का विधिवत गठन करना अनिवार्य है। इसके अलावा, पिछले वित्तीय वर्ष के अनंतिम खातों और उससे पिछले वर्ष के ऑडिटेड खातों को समय पर अपलोड करना होगा। साथ ही, संवैधानिक प्रावधानों के तहत हर पांच साल में राज्य वित्त आयोग का गठन और उसकी रिपोर्ट पर 'एक्शन टेकन रिपोर्ट' विधानसभा में पेश करना जरूरी है।
अनुदान के वितरण के लिए केंद्र ने जनसंख्या आधारित फॉर्मूला अपनाया है। किसी भी राज्य का 90% हिस्सा उसकी अनुमानित 2026 की ग्रामीण जनसंख्या पर आधारित होगा, जबकि 10% हिस्सा राज्य के भौगोलिक क्षेत्रफल को दिया जाएगा। इससे अधिक आबादी वाले राज्यों को संसाधनों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित हो सकेगी।

