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मानवीय भावनाओं के रंग भरती है चौपाळ

आपणो राजस्थान
मानवीय भावनाओं के रंग भरती है चौपाळ

हमारे देश की संस्कृति ने  गांवों और कस्बों से होती हुई पूरी दुनिया को अपने आगोश में ले रखा है...पगडंडियों से उठती माटी की महक में मंदिरों से गूंजती घंटियां...मस्जिदों से आती अजान, गुरुद्वारों से सुनाई देता शबद गान ही नहीं,गांव की चौपालों की चर्चाओं में हमारी संस्कृति का समवेत स्वर सुनाई देता है...यही वजह है कि...मेट्रोपॉलिटन से लेकर गांव देहात तक जिंदगी नाचती झूमती दिखाई देती है...जेठ की गरमी, तपती दोपहर और लंबे दिन,काटे नहीं कटते...मेट्रोपॉलिटन शहरों में तो एसी और कूलर जिंदगी को सुकून दे देते हैं,लेकिन  ग्रामीण परिवेश में चौपाल पर...दोपहर का समय,बुजुर्गों के लिए परेशानी भरे होते हुए भी,आनंद की अनुभूति कराते हैं...अलसाए भरे दिनों में भी,जीवन का गान सुनाई देता है...चौपाल दरअसल हमारे जीवन का एक सामुदायिक मिलन स्थल है...चौपाल,गांव, देहात और ढाणी के चौक चौराहों के बीच बना एक ऐसा चबूतरा...या खुली जगह होती है...जो छायादार पेड़ से घिरी...यहां बैठ कर लोग जीवन से जुड़े विषयों पर चर्चा करते हैं...संवाद करते हैं...सामाजिक गतिविधियां करते हैं...गांव के बड़े-बुजुर्ग और पंच बैठकर... आपसी विवादों का निपटारा करते हैं...और सामाजिक मुद्दों पर राय-मशविरा करते हैं...यह जगह लोगों के बीच अनौपचारिक बातचीत,सुख-दुख बांटने और मनोरंजन का केंद्र होती है...चौपालों पर सामूहिक चर्चाएं और जन संवाद भी होती है...दरअसल चौपाल ग्रामीण परिवेश से जुड़ा एक ऐसा सार्वजनिक जगह है...जो समतल जमीन से कुछ ऊंचाई पर...गोल या चौकोर स्थान होता है, जहां बैठ कर लोग...राय मशविरा करते हैं और अपने विवाद का सर्वसम्मति से निपटारा करते हैं...यह जगह केवल वाद विवाद और संवाद या फिर मनोरंजन की ही नहीं होती,यहां पर गांव,कस्बे और ढाणी की तकदीर और तस्वीर भी बनती है,बदलती है...जन जागरण होता है,जन मानस तैयार होता है,और इसी के आधार पर गांव की आवाज बनती है...गंभीर मसलों पर आम राय बनती है...व्यक्तिगत राय का सार्वजनिकीकरण होता है...

हमारे जीवन के कई आयाम है...इसमें मानवीय भावनाओं के सभी रंग बिखरे हुए है...इसमें धर्म है,कर्म है,अध्यात्म है,रीति नीति है,आर्थिक,सामाजिक,पारिवारिक पहलु है...तो राजनीति कैसे अछूती रह सकती है...राज की नीति का सफर भी तो राजनीति का ही एक हिस्सा होता है...उससे शासन और सत्ता को अलग करके नहीं देखा जा सकता...सत्ता के सरोकार और उसका संबंध सीधे जनता से जुड़ा होने के कारण...सरकारें भी प्रत्यक्ष रुप उससे जुड़ी होती है...लोकतांत्रिक व्यवस्था में...जनता के प्रति जवाबदेही का रास्ता यहीं से होकर जाता है...चौपाल पर बैठने वाली सरकार...उस पारंपरिक और जमीनी राजनीतिक शैली का हिस्सा है,जहां शासन और प्रशासन...गांवों और कस्बों की चौपालों पर,लोगों के बीच बैठकर संवाद करती है...वह अपनी योजनाओं के प्रचार-प्रसार और समस्याओं के तुरंत समाधान के लिए उपयोग करती है...

राजस्थान में सरकारी चौपालों का इतिहास...प्रशासनिक विकेंद्रीकरण और जन-कल्याण का रहा है...गांव-ढाणी तक प्रशासन की पहुंच आसान बनाने,जन समस्याओं का मौके पर समाधान करने...और योजनाओं का लाभ लोगों तक पहुंचाने के लिए...विभिन्न सरकारों ने...समय-समय पर इस अवधारणा को अपनाया...दो तरफा संपर्क की इस व्यवस्था में...सरकार का लोगों से सीधा संवाद होता है...उनकी शिकायतों और समस्याओं का...मौके पर निस्तारण होता है...छोटी और स्थानीय समस्याओं का तुरंत समाधान होता है...और सत्ता के मुखिया को योजनाओं के फायदे और नुकसान का जमीनी स्तर पर जानकारी मिलती है,मूल्यांकन होता है,और समस्याओं को दुरुस्त करने का अवसर भी मिलता है...ऐसा नहीं है कि भजनलाल शर्मा की बीजेपी सरकार...पहली बार ग्राम विकास चौपाल के माध्यम से... जनता से सीधा संवाद कर रही है...राजस्थान की चुनावी राजनीति में बदलाव का नया दौर...और चौपाल और गांव चलो अभियान को संगठित रूप देने का श्रेय...भैरों सिंह शेखावत को जाता है...1970 और 1980 के दशक में उन्होंने...जनसंघ और भाजपा को ग्रामीण स्तर तक पहुंचाने के लिए...चौपालों का सहारा लिया...सत्ता और जनता के बीच सीधा संवाद स्थापित करने की एक सशक्त ग्रामीण परंपरा है...जिसकी शुरुआत भैरोंसिंह शेखावत ने की...उस दौर में चौपाल केवल चर्चा का केंद्र नहीं, बल्कि चुनावों में वोट बैंक साधने,जातिगत समीकरणों को संतुलित करने और स्थानीय नेतृत्व तैयार करने की पाठशाला रही है...

कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों के मुख्यमंत्री और मंत्री सत्ता में रहते हुए...गांवों में रात्रि चौपाल आयोजित करते रहे हैं...इसका उद्देश्य सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत जानना... और समस्याओं का मौके पर ही समाधान करना है...विपक्ष भी चौपाल के जरिए जनता से सीधा संवाद बनाए रखते हैं...वह सरकार की विफलताओं पर खुली बहस कर माहौल बनाते है...अस्सी के दशक में भैरोंसिंह शेखावत पहली बार...सरकार को जनता के पास लेकर गए...गांव ढाणी,चौक चौराहों और चौपाल तक पहुंची उनकी सरकार ने ,लोक संवाद की इस परंपरा को,ग्राम स्वराज के संकल्प को पूरा करने के लिए... जन-सुनवाई को सशक्त माध्यम बनाया...इस व्यवस्था को अपनाते हुए बाद की अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे की सरकारों ने...चौक चौराहे और चौपाल से गुजरते हुए...अपना राजनीतिक सफर तय किया...वर्तमान संदर्भ में,बीजेपी की सरकार ग्राम विकास चौपाल के माध्यम से गांवों में...रात्रि विश्राम और जन-सुनवाई जैसे कदम उठा रही है...मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा इन दिनों...खुद राज्य के दूरदराज के गांवों में जाकर...लोगों से सीधा संवाद कर रहे हैं...गांवों में सिर्फ सभाएं ही नहीं कर रहे हैं, बल्कि लोगों के बीच जाकर ...उनकी जिंदगी को करीब से समझने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं... वे गांवों में रात्रि विश्राम कर रहे हैं...सुबह गांव की गलियों में घूम रहे हैं...किसानों के खेतों तक पहुंच रहे हैं...महिलाओं से उनके घर आंगन में संवाद कर रहे हैं...वे जनता और प्रशासन के बीच की दूरी कम कर रहे हैं...योजनाओं का लाभ वास्तविक लाभार्थियों तक सीधे पहुंचा रहे हैं...हालांकि सरकार के चौपाल तक पहुंचने के कई फायदे हैं, तो कई बार उसे विरोध के स्वर भी सुनाई देते हैं...कई बार यह चौपाल राजनीतिक अखाड़े...या विरोध प्रदर्शन का मंच भी बन जाती है...जमीनी स्तर पर अधिकारियों की कार्यप्रणाली में सुधार न होने से...यह केवल एक औपचारिकता भी बनकर रह जाती है...

चौपाल की इसी परंपरा ने... आजादी के आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई...जयनारायण व्यास से लेकर अशोक गहलोत की राजनीतिक पहचान, उन गली कूंचों से होकर सत्ता के शिखर तक पहुंची...सदियों से संवाद की यह परंपरा राजनीतिक दलों और उनकी सरकारों का सफर...चौपाल से होती हुई आज भी बदस्तूर जारी है...आज सरकारी चौपाल सिर्फ बातचीत का माध्यम नहीं रह गई है, बल्कि यह तुरंत न्याय और प्रशासन को सीधे जनता के दरवाजे तक पहुंचाने का एक सशक्त प्रशासनिक साधन बन चुकी है...
 

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