अमेरिका में रूस के खिलाफ प्रतिबंधों को कड़ा करने वाले एक नए विधेयक में संशोधन की मांग सामने आई है। डेमोक्रेट सांसद स्टेनी होयर ने सीनेट से पास हुए ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट’ में बदलाव का प्रस्ताव दिया है। इसके तहत रूस के शीर्ष कारोबारी साझेदारों के रूप में भारत समेत 10 देशों के नाम सीधे तौर पर कानून में शामिल करने की मांग की गई है।
यह विधेयक पिछले महीने 86-11 के बहुमत से अमेरिकी सीनेट से पास हुआ था। इसका मुख्य उद्देश्य रूसी नेतृत्व और उसके ऊर्जा क्षेत्र पर शिकंजा कसना है। इसके साथ ही, उन जहाजों के ‘शैडो फ्लीट’ (गुप्त बेड़े) पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है, जिनकी मदद से रूस तेल निर्यात पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचता है। अमेरिका का तर्क है कि रूस इस कच्चे तेल की बिक्री से मिलने वाली राशि का इस्तेमाल यूक्रेन के खिलाफ युद्ध में कर रहा है।
ट्रंप को मिल सकते हैं कड़े अधिकार
सीनेट से पास हुए मूल विधेयक में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को यह अधिकार देने का प्रस्ताव है कि वे रूस के बड़े तेल खरीदार देशों पर 100% तक अतिरिक्त शुल्क (टैरिफ) लगा सकें। हालांकि, उस मसौदे में देशों के विशिष्ट नाम नहीं थे, बल्कि केवल दुनिया के शीर्ष पांच तेल-गैस खरीदारों का जिक्र था।
अब सांसद स्टेनी होयर द्वारा लाए गए संशोधन में जिन 10 देशों के नाम स्पष्ट रूप से जोड़े जाने की मांग की गई है, उनमें भारत और चीन के अलावा तुर्की, अजरबैजान, हंगरी, स्लोवाक गणराज्य, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सिंगापुर, कजाकिस्तान और किर्गिज गणराज्य शामिल हैं। राष्ट्रपति ट्रंप के पास अंतिम हस्ताक्षर के लिए पहुंचने से पहले इस विधेयक को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) से पारित कराना अनिवार्य है। अमेरिका में 3 नवंबर को मध्यावधि चुनाव होने हैं, जिसके चलते प्रतिनिधि सभा के पास इस पर विचार करने के लिए केवल चार दिन बचे हैं।
डेमोक्रेट्स के भीतर ही विरोध के सुर
इस विधेयक और राष्ट्रपति को मिलने वाली असीमित टैरिफ शक्तियों को लेकर डेमोक्रेट सांसदों में ही मतभेद उभर आए हैं। डेमोक्रेट सांसद ग्रेगरी मीक्स ने एक अलग संशोधन पेश किया है। इसमें विधेयक के ‘प्रावधान-113’ को पूरी तरह हटाने की मांग की गई है। इसी प्रावधान के तहत राष्ट्रपति को रूस के व्यापारिक साझीदारों पर 100% तक टैरिफ लगाने का व्यापक अधिकार मिलने का प्रस्ताव है।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत रूस से कच्चा तेल आयात करने वाले दुनिया के प्रमुख देशों में शामिल है। अमेरिकी कानून में यदि इन देशों के नाम औपचारिक रूप से जुड़ते हैं और भारी-भरकम टैरिफ का प्रावधान लागू होता है, तो इससे भारत की ऊर्जा खरीद और रणनीतिक व्यापारिक हितों पर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि इस पूरे विधाई घटनाक्रम पर नई दिल्ली की पैनी नजर बनी हुई है।
