मां के पल्लू से जुड़ी बचपन की वो मासूम यादें
कई टोगड़ो ह्वे ज्यूं लारे लारे घूमे,यह बात भले ही अब हर घर परिवार में सुनाई देती हो या नहीं,लेकिन आज से चालीस पचास साल पहले हर घर में मां अपने बच्चों को यह कहते सुनाई देती थी। घर का कोई कामकाज हो या फिर वार त्योहार,आसपास मेलजोल हो या ननिहाल ददियाल आते जाते,मां का हाथ पकड़कर,उसकी साड़ी का पल्लू पकड़ उसके ओळे टोळे घूमने पर तंग आती मां के मुंह से अक्सर ये शब्द निकल ही जाते थे कि कई टोगड़ो ज्यूं म्हारे आगे लारे घूमे। इतना ही नहीं,घर परिवार के अन्य सदस्य भी यह कहने से नहीं चूकते,कि बड़े होते जा रहे हो,अब तो मां का पल्ला पकड़कर चलना छोड़ दे। इसमें भी उनका प्यार झलकता है।
मां के पल्लू की छांव में छिपी जन्नत
हर बच्चा अपनी मां का पल्लू पकड़कर चलना चाहता है,उसका हाथ पकड़ कर चलना चाहता है,चाहे उसके बच्चों के भी बच्चे क्यूं न हो जाए। क्यूंकि उस पल्लू के नीचे उसको जन्नत नसीब होती है। अब बच्चे तो बच्चे,उसके हर शब्द का एक मतलब होता है,लेकिन वह होता समझ से परे है। ज्यों ज्यों उम्र और अनुभव बढ़ता है,धीरे धीरे उन शब्दों का अर्थ समझ में आता है। कई बार तो शब्दों का अर्थ तलाशने में उम्र बीत जाती है,लेकिन मां के हर शब्द को समझना,यानी काल से परे होकर यात्रा करने जैसा लगता है।
मां के त्याग, तपस्या और अटूट ममत्व की अनकही अभिव्यक्ति
हमारे लौकिक जीवन के हर तीज त्योहार के पीछे जो भी रहस्य छुपा है,उम्र के पड़ाव और उसके ठहराव के बाद ही समझ आता है,जब वह खुद उस जगह तक पहुंचता है। बछ बारस का त्योहार भी एक ऐसा अनूठा पर्व है,जो सिर्फ मां की भावनाओं की एक अबूझ अभिव्यक्ति है। कहने को तो यह पर्व गाय और बछड़े की पूजा अर्चना से संबंधित है,और मां का अपने पुत्रों की लंबी उम्र के लिए किया गया व्रत है। पति और पुत्र के बीच,मजबूती के साथ सामाजिक और पारिवारिक केन्द्र बिंदू बनी एक नारी,दोनों को दुनिया की नजरों से बचाए रखते हुए,उनके सुख दुख,यश अपयश का साक्षी बन कर,रक्षा और सुरक्षा की ढ़ाल बनकर,सबसे आगे बेखौफ मजबूती से खड़ी रहती है और आने वाली हर बला को घर की चौखट तक नहीं पहुंचने देती। यही कारण है कि हर घर परिवार,हर मुसीबत से सुरक्षित रहता है। चाहे तप से हो,बल से हो,बुद्धि से हो या फिर ईश्वर के दिए एक विशेष गुण,जो हर किसी में नहीं होता। वह है धैर्य,संयम और साहस,जो हर तरह की विसंगतियों को भी,संगतियों में बदलने का माद्धा रखता है। वह खुद की सुख सुविधा और कल्याण की कामना नहीं करती,बल्कि अपने पति और बच्चों के सुख में ही अपना सुख ढ़ूंढ़ती है। दूसरों को खुश देखकर खुद को खुशी का अनुभव कराने की यह क्षमता,उसे जीवन की तपस्या और साधना से मिलती है। हर व्रत और उपवास में परमार्थ कल्याण की भावना,उसे सामान्य से विशेष बना देती है। चाहे पति के लंबी उम्र की कामना हो या फिर पुत्र के दीर्घायु की कामना,अवसर विशेष पर व्रत और उपवास रखकर सबके लिए मंगल कामना में खुद को समाहित करना आसान काम नहीं है।
मां की ममता से परिवार की नींव मजबूत
यह एक लंबी तपस्या है,जो उसके जीवन की अंतिम सांस तक चलती रहती है,बिना किसी को कुछ पढ़े,कहे और सुने। पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों और संस्कारों के साथ,उम्र के हर पड़ाव पर,अपने स्वअर्जित ज्ञान और अनुभव से,बच्चों को वही संस्कार समर्पित करने को आतुर,अनपढ़ और अनगढ़ एक महिला,आज भी बछ बारस के दिन,सिर्फ गाय और बछड़े की पूजा अर्चना कर,बस इतना ही सिखाती है कि बच्चों की उम्र लंबी होगी,तो वे अपने परिवार के आधार को मजबूत कर पाएंगे। अगर वे कमजोर हो गए,समय से पहले साथ छूट गया,तो परिवार बिखर जाएगा,पारिवारिक तानाबाना अस्तव्यस्त हो जाएगा,रिश्तों की उलझनों को सुलझाने का समय नहीं मिल पाएगा और बिना मूल केन्द्र के,सिर्फ भटकाव के अलावा कुछ हासिल नहीं होगा। बात छोटी सी,मगर बहुत गंभीर है।
मां-बेटे के स्नेह से आगे परिवार और वंश परंपरा का पर्व
बछ बारस का पर्व सिर्फ मां बेटे के प्रेम,प्यार और स्नेह तक सीमित नहीं है। एक गाय और बछड़े की पूजा अर्चना तक सीमित नहीं है। इसके पीछे का रहस्य बहुत गहरा है,जिसे समझना जरुरी है। यह तो एक प्रतीक है,पारिवारिक और सामाजिक बंधनों का संबंधों का। इस बहाने से ही सही,एक मां अपने बच्चे के सर्वकल्याण के लिए उसके लिए लंबी उम्र की कामना करती है,वह उसके काल और अकाल मृत्यु के बीच खड़ी होकर,अपने वंश परंपरा को जीवित रखने की जद्दोजहद करती है। ग्रामीण परिवेश में तो यह सब कुछ सहज और सरल दिखाई देता है,लेकिन अधुनातन जीवन शैली और एकल परिवार व्यवस्था में गाय बछड़े की पूजा के लिए विशेष तैयारियां करनी पड़ती है।
बदलते दौर में संस्कृति, संस्कार और रिश्तों की मिठास का पर्व
बदलती जीवन शैली और परिवर्तन के इस दौर में,भले ही तीज त्योहार के मायने बदलते जा रहे हो,लेकिन आज भी प्रत्यक्ष रुप से हो या परोक्ष रुप से,यह पर्व श्रद्धा और उत्साह से मनाया जाता है। इसके पीछे धार्मिक,आध्यात्मिक,पारिवारिक और सामाजिक,आर्थिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष भी जुड़े हैं। ये सारे तत्व द्विपक्षीय न होकर एक पक्षीय है,और मकसद सिर्फ हमारी सांस्कृतिक चेतना को बनाए रखना है,उसे बचाए रखना है। भारतीय परिवेश में गाय की महत्ता सर्वविदित है,सर्वस्वीकार्य है। ग्रामीण परिवेश इसके बिना अधूरा माना जाता है। जीवन की विकास यात्रा में गाय सहचर है। उसके बिना यात्रा अधूरी मानी जाती है। बछ बारस का पर्व भी एक ऐसा ही त्योहार है,जो जीवन में उत्साह का संचार करता है। इसमें उत्साह है,उमंग है,हंसी खुशी,सुख भी है। धर्म अध्यात्म,ज्ञान और ध्यान,कला और संस्कृति,पारिवारिक और सामाजिक बंधनों में बंधकर यह पर्व,संबंधों की मिठास और उसकी खुशबू,दिल और दिमाग को तरोताजा कर देता हैं। खासकर मां और बेटे के संबंधों को समर्पित यह पर्व,हर किसी को यह महसूस करवा देने के लिए काफी है कि यूं टोगड़े ज्यूं म्हारे आगे लारे घूमे है।
