रक्षा मंत्रालय ने भारतीय वायुसेना (IAF) के बेड़े को आधुनिक बनाने के लिए एक लाख करोड़ रुपये के प्रस्ताव को आगे बढ़ाया है। इसके तहत 60 मीडियम ट्रांसपोर्ट विमानों (MTA) की खरीद की प्रक्रिया शुरू की गई है। यह देश के सबसे बड़े रक्षा अधिग्रहण अभियानों में से एक है, जिसका मुख्य उद्देश्य चार दशक पुरानी सोवियतकालीन एंतोनोव-32 (An-32) विमानों की जगह नए और आधुनिक विमानों को शामिल करना है।
इस मेगा डील के तहत एयरबस, लॉकहीड मार्टिन और एम्ब्रेयर जैसी दिग्गज वैश्विक एयरोस्पेस कंपनियां आमने-सामने हैं। इस दौड़ में एयरबस का A400M, एम्ब्रेयर का C-390M मिलेनियम और लॉकहीड मार्टिन का C-130J सुपर हरक्युलिस प्रमुख दावेदार हैं।
पुरानी होती एंतोनोव-32 बेड़े को विदाई की तैयारी
IAF में एन-32 विमानों ने चार दशकों से अधिक समय तक सेवा दी है। अंडमान-निकोलस द्वीप समूह के घने जंगलों से लेकर पूर्वी लद्दाख के ठंडे मरुस्थलों तक इन विमानों ने हर कठिन भौगोलिक परिस्थिति में सैनिकों और साजो-सामान को पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई है। वर्तमान में वायुसेना के पास इस श्रेणी के सौ से अधिक विमान सेवा में हैं, जिनकी पेलोड क्षमता करीब 7 टन है।
जुलाई में जोरहाट के पास हुए An-32 हादसे के बाद इस पुराने बेड़े को बदलने की मांग ने और जोर पकड़ लिया है। इस दुर्घटना में पाँच क्रू मेंबर की जान चली गई थी। नए विमानों के आने से न केवल एन-32 बल्कि भारी और पुरानी होती इल्युशिन-76 (Il-76) बेड़े पर निर्भरता भी कम होगी। Il-76 की पेलोड क्षमता करीब 45 टन है और यह वायुसेना की रीढ़ माना जाता है।
रेस में शामिल प्रमुख विमान और उनकी क्षमताएं
वायुसेना की इस मेगा डील में शामिल तीनों विमानों की तकनीकी क्षमताएं अलग-अलग मोर्चों पर उनकी उपयोगिता तय करती हैं।
एयरबस का A400M एटलस सामरिक और रणनीतिक दोनों भूमिकाओं में फिट बैठता है। यह बख्तरबंद वाहनों समेत 37 टन तक का वजन ढोने में सक्षम है। बड़े आकार के बावजूद यह छोटे और बिना पक्के रनवे से भी उड़ान भर सकता है।
एम्ब्रेयर का C-390M मिलेनियम नई पीढ़ी का विमान है, जो अत्याधुनिक एवियोनिक्स और फ्लाई-बाय-वायर कंट्रोल से लैस है। 26 टन पेलोड क्षमता वाला यह विमान कार्गो, सैनिक परिवहन, पैराशूट ड्रॉप और मेडिकल इमरजेंसी के बीच तेजी से स्विच करने में माहिर है।
लॉकहीड मार्टिन का C-130J इस सूची में एकमात्र ऐसा विमान है जो पहले से ही भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल है। 20 टन से अधिक वजन ले जाने में सक्षम यह विमान टैक्टिकल एयरलिफ्ट से लेकर मेडिकल इवेक्यूएशन और स्पेशल ऑपरेशन तक कई भूमिकाएं निभाता है। लद्दाख के ऊंचे पहाड़ी एयरफील्ड्स पर इसका प्रदर्शन पहले ही परखा जा चुका है।
रणनीतिक जरूरतें और पूर्वी मोर्चे पर तैनाती
पूर्वी लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश जैसे सीमावर्ती इलाकों में सैन्य साजो-सामान पहुँचाने के लिए ट्रांसपोर्ट फ्लीट वायुसेना की रीढ़ है। गलवान संकट के बाद से सामरिक और रणनीतिक परिवहन विमानों की अहमियत और ज्यादा बढ़ गई है।
सेना के साजो-सामान के अलावा इन विमानों का उपयोग मानवीय सहायता और आपदा राहत कार्यों में भी बड़े पैमाने पर होता है। भारत ने हाल ही में वेनेजुएला में आए भूकंप के दौरान राहत कार्यों के लिए सेना की प्रसिद्ध 60 फील्ड एम्बुलेंस यूनिट को तैनात कर अपनी इस क्षमता का परिचय दिया था। नए विमानों के शामिल होने से वायुसेना की यह क्षमता और अधिक मजबूत होगी।
