सुप्रीम कोर्ट ने दिवंगत अभिनेत्री श्रीदेवी के परिवार और चेन्नई की एक जमीन पर दावा करने वाले पक्षों को आपसी सहमति से मामले को सुलझाने का निर्देश दिया है। यह विवाद 2.7 एकड़ के एक प्लॉट के मालिकाना हक को लेकर है, जो 1988 के एक सेल डीड के जरिए श्रीदेवी के पास आया था।
बुधवार को न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन और न्यायमूर्ति अरुण पल्ली की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि दोनों पक्ष आपस में बैठकर इस विवाद को सुलझाने का प्रयास करें। अदालत ने इसके लिए एक सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को मध्यस्थ नियुक्त करने का प्रस्ताव दिया है। मामले की अगली सुनवाई 18 दिसंबर को तय की गई है।
क्या है जमीन का पूरा विवाद
श्रीदेवी का 2018 में निधन होने के बाद, उनके पति और फिल्म निर्माता बोनी कपूर ने चेन्नई के शोलिंगनल्लूर गांव में स्थित इस 2.7 एकड़ जमीन को अपने और अपनी दोनों बेटियों जाह्नवी व खुशी कपूर के नाम ट्रांसफर करवा लिया था। इसके बाद, मूल मालिक एम.सी. चंद्रसेकरन के कानूनी वारिस होने का दावा करने वाले तीन लोगों ने इस ट्रांसफर पर सवाल उठाया।
विरोधी पक्षों ने जनवरी 2025 में चेन्नई की एक ट्रायल कोर्ट में मुकदमा दायर कर 1988 के उस सेल डीड को रद्द करने की मांग की, जो श्रीदेवी के पक्ष में निष्पादित किया गया था। बोनी कपूर ने इस मुकदमे को खारिज करने की मांग की थी, लेकिन ट्रायल कोर्ट से राहत न मिलने पर उन्होंने मद्रास हाईकोर्ट का रुख किया था। हाईकोर्ट ने अप्रैल 2026 में बोनी कपूर के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनकी याचिका मंजूर कर ली थी, जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई।
वकीलों की दलीलें और कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान बोनी कपूर की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंहवी पेश हुए, जबकि विरोधी पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचन्द्रन और अधिवक्ता बालाजी श्रीनिवासन ने पैरवी की। सिंहवी ने दलील दी कि मुकदमा दायर करना कानून का दुरुपयोग है, क्योंकि चंद्रसेकरन ने 1995 में अपनी मृत्यु तक कभी 1988 के सेल डीड को चुनौती नहीं दी थी। उन्होंने यह भी कहा कि सेल डीड के करीब 40 साल बाद यह मुकदमा दायर किया गया है, जो परिसीमा अधिनियम (limitation period) के तहत बाधित है।
वहीं, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा कि इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि मूल रूप से जमीन पर चंद्रसेकरन का स्वामित्व था और याचिकाकर्ता उनके ही बच्चे हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि मुख्य सवाल यह है कि क्या उस जमीन पर उनका पांचवां हिस्सा (one-fifth share) बनता था या नहीं।
हाईकोर्ट का पिछला फैसला और कानूनी पेच
अप्रैल 2020 के अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा था कि मुकदमा दायर करने वाले लोग चंद्रसेकरन के क्लास-1 कानूनी वारिस नहीं हैं। हाईकोर्ट ने इस बात पर भी हैरानी जताई थी कि अभिनेत्री के निधन के बाद जब संपत्ति का टाइटल कपूर परिवार के नाम ट्रांसफर हो रहा था, तब 2023 में ही उन्हें इस खरीद की जानकारी मिलने का दावा करना पूरी तरह से अविश्वसनीय है।
दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल करने वालों का तर्क है कि हाईकोर्ट ने दस्तावेजों को स्वीकार करते हुए एक तरह का "मिनी ट्रायल" कर लिया, जबकि कानूनी वारिस होने के स्टेटस से जुड़े इन सवालों का निपटारा ट्रायल कोर्ट की नियमित कार्यवाही के दौरान ही होना चाहिए था। सुप्रीम कोर्ट ने अब दोनों पक्षों को मध्यस्थता के जरिए समाधान तलाशने का मौका दिया है।
