छिंदवाड़ा। छिंदवाड़ा का पोला ग्राउंड सिर्फ एक मैदान नहीं, बल्कि जिले की कृषि संस्कृति और वर्षों पुरानी परंपरा की पहचान माना जाता है। इस मैदान का नाम सीधे तौर पर पोला पर्व से जुड़ा हुआ है। पोला पर्व मुख्य रूप से किसानों और बैलों को समर्पित त्योहार है, जिसमें किसान अपने उन पशुधन साथियों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करते हैं, जिन्होंने खेती-किसानी में उनका वर्षों तक साथ दिया।पोला पर्व भादो मास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है। खेती के महत्वपूर्ण काम पूरे होने के बाद किसान अपने बैलों को नहलाकर सजाते हैं। उनके सींगों पर रंग लगाया जाता है, गले में घंटियां और सजावटी सामान पहनाए जाते हैं तथा विशेष रूप से तैयार किए गए कपड़े, जिन्हें स्थानीय रूप से झूल कहा जाता है, पहनाए जाते हैं। इसके बाद बैलों की पूजा कर उन्हें विशेष पकवान खिलाए जाते हैं।
बैलों को धन्यवाद देने की परंपरा
किसान अजानिया संदीप चौधरी बताते हैं कि भादो के अंतिम सप्ताह तक खेतों में खेती के अधिकांश काम पूरे हो जाते हैं। बैल किसानों के सबसे मेहनती साथियों में रहे हैं, इसलिए पोला पर्व उनके प्रति धन्यवाद और सम्मान व्यक्त करने का अवसर है।परंपरा के अनुसार पोला के बाद कुछ समय तक बैलों से खेती का काम नहीं कराया जाता था, ताकि उन्हें आराम मिल सके और आगामी रबी की फसल के लिए वे फिर तैयार हो सकें।पोला पर्व का विशेष रूप से महाराष्ट्र में बड़ा महत्व है। छिंदवाड़ा और पांढुर्ना क्षेत्र महाराष्ट्र की सीमा से लगे होने के कारण यहां भी लंबे समय से इस पर्व और इससे जुड़ी परंपराओं का प्रभाव देखने को मिलता है।
गुजिया, खुरमा और पापड़ी से होती है बैलों की खातिरदारी
पोला पर्व पर केवल बैलों को सजाया ही नहीं जाता, बल्कि उनकी विशेष खातिरदारी भी की जाती है। घर की महिलाएं सुबह से ही बैलों के लिए विशेष पकवान तैयार करती हैं। इनमें गुजिया, बेसन की पापड़ी और खुरमा प्रमुख रूप से शामिल होते हैं।पूजा के बाद इन पकवानों को बैलों को खिलाया जाता है। किसान अपने बैलों को रंग-बिरंगे कागज, पेंट और विशेष कपड़ों से सजाते हैं। गले में अलग-अलग तरह की घंटियां बांधी जाती हैं, जिससे पोला पर्व का माहौल और भी आकर्षक हो जाता है।
पोला ग्राउंड में सजे-धजे बैलों की लगती थी कतार
छिंदवाड़ा में जिस स्थान को आज पोला ग्राउंड के नाम से जाना जाता है, वहां परंपरागत रूप से पोला पर्व के अवसर पर सजे-धजे बैलों को एकत्र किया जाता रहा है। किसान अपने बैलों को सजाकर यहां लाते थे और उत्सव का आयोजन होता था।समय के साथ यह स्थान लोगों के बीच 'पोला ग्राउंड' के नाम से प्रसिद्ध हो गया। इस मैदान का नाम आज भी छिंदवाड़ा की कृषि संस्कृति और पोला पर्व की यादों को जीवित रखे हुए है।
16 साल से सुंदरता प्रतियोगिता, श्रेष्ठ बैल की जोड़ी को मिलता है सम्मान
छिंदवाड़ा सार्वजनिक पोला उत्सव समिति के अध्यक्ष विजय पांडे बताते हैं कि करीब 16 वर्ष पहले पोला पर्व का आयोजन लगभग बंद होने की स्थिति में पहुंच गया था। खेती में ट्रैक्टर और आधुनिक मशीनों का उपयोग बढ़ने से किसानों के बीच बैल और अन्य पशुधन पालने की परंपरा भी कम होने लगी थी।इसी परंपरा को बचाए रखने और किसानों को पशुधन पालने के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से समिति का गठन किया गया। पिछले 16 वर्षों से छिंदवाड़ा के पोला ग्राउंड में पोला उत्सव और बैलों की सुंदरता प्रतियोगिता आयोजित की जाती है।
इस प्रतियोगिता में किसान अपने बैलों को आकर्षक तरीके से सजाकर लाते हैं। सबसे सुंदर और आकर्षक बैल की जोड़ी का चयन कर उसे सम्मानित किया जाता है। आयोजन के दौरान बैलों की सुंदरता के साथ-साथ उनके रखरखाव और सजावट को भी विशेष महत्व दिया जाता है।
आधुनिक दौर में भले ही खेती के तौर-तरीके बदल गए हों, लेकिन छिंदवाड़ा का पोला ग्राउंड आज भी उस परंपरा की याद दिलाता है, जब किसान और बैल एक-दूसरे के सबसे भरोसेमंद साथी हुआ करते थे। पोला पर्व इसी रिश्ते के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और प्रेम का प्रतीक है।
