बेगूं नगर के अति प्राचीन भगवान लक्ष्मीनाथ मंदिर में सदियों से चली आ रही धार्मिक परंपरा के तहत गुरु पूर्णिमा के अवसर पर इस वर्ष भी जिंसों का प्रतीकात्मक तोल संपन्न हुआ। गुरुवार को भगवान के दरबार में हुए इस विशेष तोल के परिणामों को श्रद्धालुओं और व्यापारियों ने आने वाले कृषि वर्ष के शुभ संकेत के रूप में देखा। अधिकांश प्रमुख जिंसों के वजन में बढ़ोतरी दर्ज होने से क्षेत्र में अच्छी पैदावार और समृद्धि की उम्मीद जताई जा रही है।
परंपरा के अनुसार बुधवार शाम मुख्य बाजार के व्यापारी एवं दुकानदार सामूहिक रूप से मंदिर में एकत्र हुए। सोना तोलने वाले तराजू से जौ, मक्का, उड़द, गेहूं, चावल, मूंगफली, ज्वार, सरसों, मूंग, तिल्ली, चना सहित विभिन्न जिंसों तथा पीली और काली मिट्टी को समान वजन में तौलकर उनकी अलग-अलग पुड़ियां बनाई गईं। इन पुड़ियों को एक डिब्बे में रखकर ताला लगाया गया और भगवान लक्ष्मीनाथ की प्रतिमा के समक्ष स्थापित कर आरती के बाद निज मंदिर को बंद कर दिया गया।
गुरुवार सुबह निर्धारित समय पर सभी व्यापारी पुनः मंदिर पहुंचे। सभी की उपस्थिति में मंदिर एवं डिब्बे के ताले खोले गए और प्रत्येक जिंस का दोबारा तोल किया गया। धार्मिक मान्यता के अनुसार जिन जिंसों का वजन बढ़ जाता है, उनकी पैदावार अच्छी होने का संकेत माना जाता है, जबकि जिनका वजन समान रहता है, उनकी उपज सामान्य रहने की मान्यता है।
इस वर्ष के तोल में जौ, मक्का, उड़द, गेहूं, चावल, मूंगफली, ज्वार और सरसों के वजन में बढ़ोतरी दर्ज हुई, जिसे इन फसलों की बेहतर पैदावार का शुभ संकेत माना गया। वहीं मूंग, तिल्ली और चना का वजन समान रहने से इनके सामान्य उत्पादन की संभावना व्यक्त की गई। पीली और काली मिट्टी का वजन भी बराबर रहा। धार्मिक मान्यता के अनुसार काली मिट्टी मनुष्यों तथा पीली मिट्टी मवेशियों का प्रतीक होती है। इसे मानव और पशुधन के लिए सामान्य एवं स्वस्थ परिस्थितियों का संकेत माना जाता है तथा किसी बड़ी महामारी या व्यापक रोग प्रकोप की आशंका नहीं होने का प्रतीक समझा जाता है।
जिंसों के पुनः तोल के बाद भगवान लक्ष्मीनाथ की आरती कर सुख-समृद्धि और उत्तम वर्षा की कामना की गई। उल्लेखनीय है कि बेगूं की यह प्राचीन परंपरा केवल स्थानीय व्यापारियों तक सीमित नहीं है। देश के विभिन्न शहरों तथा विदेशों में बसे अनेक भारतीय व्यापारी भी भगवान लक्ष्मीनाथ के दरबार में होने वाले इस पारंपरिक तोल के परिणामों को शुभ संकेत मानते हुए अपने व्यापारिक निर्णयों में इसे महत्व देते हैं। आधुनिक विज्ञान और तकनीक के दौर में भी इस अनूठी धार्मिक परंपरा के प्रति क्षेत्रवासियों की अटूट आस्था और विश्वास आज भी उसी श्रद्धा के साथ कायम है
