ट्रंप को लाखों,करोड़ो गंवाने के बाद भी कुछ नहीं मिला !
करीब सात दशक पहले प्रेम धवन ने लिखा था, सब कुछ लुटा के होश में आए तो क्या हुआ, दिन में अगर चराग जलाए तो क्या किया...यह हर व्यक्ति के जीवन की व्यथा कथा है, जो निकलता तो खुशी की तलाश में हैं और अक्सर दुखों से सामना होता रहता है...हताशा होती है, निराशा होती है, आकुलता और व्याकुलता के साथ चलता रहता है...राजा हो या रंक, हर कोई इसी मनोदशा के साथ जीवन यात्रा पर चलता रहता है...सफलता मिलती है तो खुशी होती है, असफलता बैचेनी के भंवरजाल में फंसा देती है...और जब समय के संदर्भ में घटनाएं, स्थितियां, परिस्थितियां और व्यवस्थाएं अनुकूल नहीं होती है तो, बैचेनी का आलम व्यथित कर देता है...जैसे तैसे उनसे बाहर निकलने के लिए, किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाता है...अपने मान और अभिमान को बनाए रखने और उसे बचाए रखने के लिए, किए जाने वाले जतन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से अधिक और कौन जान सकता है...
दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही उनके कार्य और व्यवहार ने, दुनिया भर में तहलका मचा दिया...कहीं सैन्य कार्रवाई हो या फिर शासनाध्यक्षों के साथ गैरजिम्मेदाराना व्यवहार, टैरिफ वॉर ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को तहसनहस कर दिया...जिससे आज तक कोई भी देश उबर नहीं पाया है...वेनेजुएला के बाद ईरान के साथ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई ने, दुनिया भर में युद्धों को रुकवाकर शांति का झंडाबरदार बन कर नोबल पुरस्कार चाहत को चकनाचूर कर दिया... तेहरान ने उनके दुनिया का ताकतवर नेता बनने का ख्वाब को हकीकत नहीं बनने दिया...एक दिन में निपटाकर और घोषित चार लक्ष्यों को पूरा करने के इरादे से ...वाशिंगटन से तेहरान तक का सफर उन्हें बहुत भारी और महंगा पड़ा...फ्रांस के ऐतिहासिक वर्साई के महल में डोनाल्ड ट्रंप की जोरदार आवाज में, ईरान के साथ हुए समझौते के ऐलान ने, दुनिया भर में सुकून का अहसास दिला दिया कि, चलो अब तो शांति से कारोबार, व्यापार फिर से बहाल हो सकेगा, हर देश और व्यक्ति के दिल और दिमाग का बोझ हलका हो सकेगा...लेकिन सभी को इस बात का अफसोस रहा कि उनके इस समझौते पर हस्ताक्षर की कीमत बहुत अधिक चुकानी पड़ी...बहुत कुछ झेलना पड़ा, बहुत कुछ सहन करना पड़ा...और डोनाल्ड ट्रंप ने क्या खोया और क्या पाया, इसका आंकलन उन्हें आज तत्काल नहीं, लंबे समय बाद अमेरिकीयों को भी पता चलेगा कि सब कुछ लुटा कर होश में आए तो क्या हुआ...ट्रंप अपने कार्यकाल के शुरुआत से ही, अपने कार्य व्यवहार से दुनिया भर के नेताओं की आंख की किरकिरी बने हुए हैं...तेजी से बदल रही जियो पॉलिटिक्स में, हाशिये पर आए डोनाल्ड ट्रंप के लिए तेहरान के मसले ने उनकी साख पर बट्टा लगा दिया...28 फरवरी से पहले की स्थिति में जाने के लिए, उनका हर दांव और पैतरा, और हर बदलते तेवर से बनती गैरजिम्मेदार नेता की छवि पीछा नहीं छोड़ रही थी...हालांकि वाशिंगटन को तेहरान के पास जाने की और भी कई वजहें थीं...कहा जाता है कि कई ख्वाहिशों को ख्वाहिश बनाकर रखना पड़ता है...मन में दबाकर रखना पड़ता है...
कुछ अरमान उस बारिशों की बूंदों की तरह होती है जिनको छूने की ख्वाहिश में, हथेलियां तो गिली हो जाती है, पर हाथ हमेशा खाली रहते हैं...ईरान में इस्लामिक सत्ता उखाड़ फेंकना, ईरान का परमाणु कार्यक्रम खत्म करना, ईरान के प्रॉक्सी संगठनों को खत्म करना और ईरान का बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम खत्म करना...चार मकसद को लेकर तेहरान को चौबीस घंटे में निपटाने की ख्वाहिश में वाशिंगटन से निकले, और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज में जाकर फंसे डोनाल्ड ट्रंप को वर्साई के महल के डीनर की टेबल पर हस्ताक्षर करते समय मिर्जा गालिब याद आ रहे होंगे कि, हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मिरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले...डोनाल्ड ट्रंप चले तो थे तेहरान को पाषाण युग में भेजने की चाहत लेकर, और अमेरिका ही नहीं पूरी दुनिया को ईरान के परमाणु कार्यक्रम से बचाने की हसरत लेकर, लेकिन हुआ इसका उलटा...तबाह कर गई पक्के मकान की ख़्वाहिश, मैं अपने गाँव के कच्चे मकान से भी गया...अब जबकि वाशिंगटन और तेहरान में समझौता हो गया है और पूरी दुनिया ने राहत की सांस ली है, फिर भी डोनाल्ड ट्रंप के मन में अभी भी यह चल रहा होगा कि दो हिस्सों में बंट गए है,मेरे दिल के तमाम अरमान, कुछ तुझे पाने निकले,तो कुछ मुझे समझाने निकले...

