राम की माया अपरंपार है...नाम में ही इतनी ताकत है, तो राम के स्वरुप होने से तो हद से अनहद तक की यात्रा में न तो कोई विराम है न ही अल्पविराम...व्यक्तित्व के विकास सौपान में धर्म और अध्यात्म एक पक्ष है तो, राजनीति के साथ इसकी जीवन यात्रा भी रहस्य और रोमांच से कम नहीं है...राम राज्य की परिकल्पना संजोये राजनेताओं के लिए, राम का नाम लेकर चुनावी वैतरणी पार करना बहुत आसान हो गया है...इतना ही नहीं, उनके नाम से अयोध्या में मंदिर बनाने की आहुति देने वालों ने भी, स्वार्थ या निस्वार्थ भाव रखने वालों ने भी, गिलहरी की तरह काम किया...निस्वार्थ भाव रखने वालों के लिए तो सौगंध राम की खाते हैं, हम मंदिर वहीं बनाएंगे, वह उनके जीवन काल में पूरी हुई...साथ में ऐसे लोगों के मन की मुरादें भी पूरी होने लगी जो मानते हैं कि राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट,अंतकाल पछताएगा जब प्राण जाएंगे छूट...यानी मंदिर आंदोलन में साथ निभाने वालों में ऐसे भी लोग भी थे, जो मानते हैं कि परिश्रम किया है तो उसकी कीमत भी वसूलना है...राम का वह खजाना, जहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता, ऐसी सुरक्षा के दायरे को, ऐसे लोगों में सेंधमारी कर यह सच कर दिया कि, राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट...पिछले कुछ दिनों से राम मंदिर के खजाने में सेंधमारी, और उसमें मची लूट की खबरों ने, देश और दुनिया में भगवान राम के प्रति आस्था और विश्वास रखने वालों के मन में, हलचल पैदा कर दी...इस मामले में राज की नीति तो अपना काम कर रही है, लेकिन राजनीति भी उसी तेज गति से आगे पीछे घूम रही है...विपक्ष को तो जैसे उनकी ठहरी हुई राजनीति में तेजी से गिरे पत्थर से उठने वाली लहरें साबित हो रही है, जिस पर सवार होकर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य दल उत्तरप्रदेश के चुनावी महासागर में उतरने को उतावले हो रहे हैं...राहुल गांधी हो या फिर अखिलेश यादव हर कोई, राम नाम के इस लूट कांड का फायदा उठकर, सत्ता के खजाने की चाबी हासिल करने को बेकरार है...अखिलेश यादव अयोध्या राम मंदिर में चंदा चोरी का मुद्दा उठाकर सीधे बीजेपी को ललकारने लगे हैं...चुनावी एजेंडे की फेहरिस्त में राम का नाम सबसे ऊपर रख दिया है...उनका तो यहां तक दावा है कि बीजेपी का लंका कांड अयोध्या में ही होगा...कहानी की शुरुआत होती है अयोध्या से, जहां राम मंदिर ट्रस्ट के चढ़ावे में सेंधमारी की बात सामने आई... बात हवा-हवाई नहीं थी, बल्कि बाकायदा सीसीटीवी फुटेज सामने आए...गिरफ्तारियां हुईं...अखिलेश यादव को एक ऐसा मुद्दा मिल गया, जिससे वो सीधे रामभक्तों की भावनाओं को छूते हुए... बीजेपी को कटघरे में खड़ा कर सकें...अखिलेश यादव की कोशिश यह है कि...बीजेपी ने राम मंदिर निर्माण का जो क्रेडिट लिया है, उस पर एक झटके में पानी फेरा जाए...चुनावी राजनीति में, समाजवादी पार्टी के राम नाम की लूट में शामिल होने की संभावना देखकर, राहुल गांधी भी कहां पीछे रहने वाले...वे भी इस चुनावी रामायण के अध्याय लिखने में जुट गए हैं...उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में विपक्ष, योगी सरकार की जनविरोधी नीतियों के विरोध के आधार पर नहीं, राम नाम की नाव पर सवार होकर चुनावी वैतरणी पार करने के इरादे से मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं ताकि वह राममंदिर में हुई चंदाचोरी से उपज रहे जन भावनाओं के सहारे लखनऊ तक का सफर तय कर सके...बीजेपी हालांकि इस मसले पर एक कदम जरुर पीछे है, लेकिन इस बार वह कृष्ण भगवान की मुरली की स्वर लहरियों से लोगों को रिझाने में जुट गई है...योगी आदित्यनाथ ने भगवान कृष्ण की मुरली की तान छेड़ कर अपने इरादे भी जता दिए हैं...यानी इस बार के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव मैदान में भगवान कृष्ण और भगवान राम की लीलाओं के दर्शन होंगे...यानी इस सियासी महाभारत में चुनावी चौसर अवध से निकल कर मथुरा की तरफ जा रही है...
राम नाम, राजनीति और चुनावी रणनीति
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