पश्चिम बंगाल की रेजीनगर विधानसभा उपचुनाव में ममता बनर्जी गुट को बड़ा झटका लगा है। TMC उम्मीदवार रबीउल आलम चौधरी ने शनिवार को अपना नामांकन वापस ले लिया। उन्होंने चुनाव मैदान से हटने की मुख्य वजह पार्टी का पुराना चुनाव चिह्न 'जोड़ा घास फूल' (Twin Flowers) नहीं मिलना बताया है।
रबीउल आलम ने आरोप लगाया कि उनके कार्यकर्ताओं को प्रचार करने से रोका जा रहा था और उन पर लगातार दबाव बनाया जा रहा था। इसके अलावा, उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा आवंटित किए गए नए चुनाव चिह्न को कम समय में मतदाताओं तक पहुंचाना उनके लिए मुमकिन नहीं था।
नंदीग्राम में भी पीछे हटे ममता गुट के उम्मीदवार
रेजीनगर से ठीक एक दिन पहले शुक्रवार को नंदीग्राम सीट पर भी ममता गुट की उम्मीदवार संचिता प्रधान डे ने नामांकन वापस ले लिया था। इसके बाद ममता बनर्जी ने नंदीग्राम उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार मिलन प्रधान को समर्थन देने का ऐलान किया था।
हालांकि, इस राजनीतिक घटनाक्रम के कुछ ही घंटे बाद मिलन प्रधान को 2007 के एक पुराने हत्या मामले में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। पश्चिम बंगाल की इन दोनों विधानसभा सीटों पर आगामी 6 अक्टूबर को उपचुनाव होना है और 9 अक्टूबर को नतीजे घोषित किए जाएंगे। नंदीग्राम सीट शुभेंदु अधिकारी के इस्तीफे से खाली हुई थी, जबकि रेजीनगर सीट हुमायूं कबीर के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी।
सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं ममता बनर्जी
पार्टी के नाम और 'जोड़ा घास फूल' चुनाव चिह्न को फ्रीज करने के चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। शुक्रवार को दाखिल की गई इस याचिका में चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी को पक्षकार बनाया गया है।
इससे पहले 17 सितंबर को चुनाव आयोग ने TMC के दोनों गुटों को मूल नाम और चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी। आयोग ने ममता गुट को 'ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' नाम और 'फुटबॉल प्लेयर' सिंबल दिया, जबकि अरूप रॉय गुट को 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' नाम और 'लिफाफा' चुनाव चिह्न आवंटित किया।
मई के विधानसभा चुनाव के बाद शुरू हुई थी टूट
टीएमसी में यह अंदरूनी कलह और विवाद मई में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद सतह पर आया था। जून में 58 बागी विधायकों ने ममता खेमे के उम्मीदवार को दरकिनार कर निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष का नेता चुन लिया था, जिसे स्पीकर ने भी मान्यता दे दी। इसके बाद पार्टी में पिछले 28 सालों में पहली बार दोफाड़ हो गई।
यह विवाद संसद तक भी पहुंच गया, जहां 20 लोकसभा सांसदों ने काकली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में अलग गुट बनाकर एनडीए को समर्थन दे दिया। दोनों गुटों के बीच पार्टी के नाम और मूल सिंबल पर अधिकार को लेकर चल रही खींचतान के चलते ही चुनाव आयोग ने यह फैसला लिया था।
