राजस्थान हाईकोर्ट ने चिल्ड्रेन होम और बाल देख-रेख संस्थानों से 18 वर्ष की आयु पूरी कर बाहर निकलने वाले 'केयर लीवर्स' के पुनर्वास, शिक्षा और आजीविका को लेकर अहम निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वे केयर लीवर्स को सरकारी नौकरियों, सार्वजनिक रोजगार, अनुबंध-कार्यों और सभी शैक्षणिक संस्थानों में 1 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए 12 सप्ताह के भीतर नीति तैयार कर अधिसूचित करें।
इस नीति के लागू होने तक अंतरिम राहत के रूप में राज्य सरकार को सभी सरकारी चयन प्रक्रियाओं में इन युवाओं को आयु सीमा में 5 वर्ष की छूट और आवेदन व परीक्षा शुल्क से पूरी तरह छूट देने को कहा गया है। इसके साथ ही स्वरोजगार, स्टार्टअप और आवास स्थापित करने के लिए 5 लाख रुपए तक की वित्तीय सहायता या ब्याज-मुक्त ऋण उपलब्ध कराने के भी निर्देश दिए गए हैं।
गठन होगा 'केयर लीवर्स सचिवालय'
अदालत के निर्देश के मुताबिक, केंद्र सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के तहत और राज्य स्तर पर प्रत्येक जिले में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के अधीन 'केयर लीवर्स सचिवालय' स्थापित किए जाएंगे। केंद्रीय स्तर पर इस सचिवालय का नेतृत्व कम से कम संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी द्वारा किया जाएगा।
जिला स्तर पर बनने वाले इस निकाय में जिला बाल संरक्षण अधिकारी, एक समर्पित आफ्टरकेयर अधिकारी और बाल अधिकार क्षेत्र से जुड़े गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। यह सचिवालय चिल्ड्रेन होम छोड़ने वाले हर बच्चे का एक सेंट्रलाइज्ड डिजिटल डेटाबेस तैयार करेगा ताकि उनकी आजीविका और शिक्षा की सतत निगरानी की जा सके।
दस्तावेजों और स्कॉलरशिप की पुख्ता व्यवस्था
संस्था छोड़ने से पहले हर बच्चे की सुरक्षा और भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए 17.5 वर्ष की उम्र से ही पहचान पत्र बनवाने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। इनमें आधार कार्ड, पैन कार्ड और बैंक खाता जैसे जरूरी दस्तावेज शामिल हैं। स्पष्ट किया गया है कि बिना आफ्टरकेयर आईडी कार्ड के किसी भी बच्चे को संस्थान से बाहर नहीं भेजा जाएगा।
उच्च शिक्षा और पेशेवर पढ़ाई को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार एक 'केयर लीवर शिक्षा और स्कॉलरशिप फंड' का गठन करेगी। इसके तहत उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे युवाओं को न्यूनतम 4,000 रुपए प्रति माह और प्रोफेशनल कोर्स करने वालों को 6,000 रुपए प्रति माह की छात्रवृत्ति के साथ हॉस्टल की सुविधा भी प्रदान की जाएगी।
निगरानी के लिए विशेष निकायों का गठन
नीति के निर्माण और उसकी प्रभावी निगरानी के लिए अदालत ने 30 दिनों के भीतर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में 'राज्य बाल न्याय परिषद' का गठन करने का आदेश दिया है। इसके अलावा, प्रत्येक राजस्व संभाग स्तर पर संभागीय आयुक्त और वरिष्ठतम जिला जज की सह-अध्यक्षता में 'संभागीय बाल न्याय आयोग' भी बनाए जाएंगे।
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए हाईकोर्ट ने याचिका को फिलहाल लंबित रखा है। अदालत ने राज्य के मुख्य सचिव, गृह, चिकित्सा और सामाजिक न्याय विभाग के सचिवों सहित अन्य संबंधित पक्षों को 8 सप्ताह के भीतर अनुपालना शपथ-पत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 22 नवंबर 2026 को होगी।
