मानसून की विदाई के बाद से ही राजस्थान के कई जिलों में पीने के पानी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। प्रदेश के 14 शहरों में अब चार दिन में एक बार पेयजल आपूर्ति हो रही है, जबकि 100 से अधिक शहरी इलाकों में हर 48 घंटे बाद नल खुल रहे हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए जल संसाधन विभाग और जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (PHED) ने आपातकालीन कार्ययोजना पर काम शुरू कर दिया है।
सबसे खराब हालात पाली जिले के हैं, जहां मानसून के दौरान औसत से आधी यानी महज 221 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई। हेमावास, खारड़ा, गजनई और कंटालिया जैसे प्रमुख बांध पूरी तरह सूख चुके हैं। जिला मुख्यालय से 70 किलोमीटर दूर केरली और भालेलाव जैसे गांवों में लोगों को 10 दिन तक पानी नहीं मिल रहा है। भालेलाव गांव में महिलाएँ रात के समय ट्यूबवेल और जीएलआर (छोटी टंकी) से मटकियों में पानी भरने को मजबूर हैं।
पाली में 10 दिन तक का इंतजार और माइंस के पानी का सहारा
पाली जिले में पीने के पानी का 90 फीसदी से ज्यादा हिस्सा बांधों से आता है। जवाई बांध में मार्च 2027 तक का पानी शेष बताया जा रहा है, लेकिन स्थिति को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने जलापूर्ति अंतराल बढ़ाने का फैसला किया है। दीपावली के बाद पाली, मारवाड़ जंक्शन, सोजत और फालना जैसे शहरों में 96 घंटे यानी चार दिन में, जबकि गांवों में 120 घंटे यानी पांच दिन में एक बार पानी की सप्लाई होगी।
जलदाय विभाग के एक्सईएन कानसिंह राणावत ने बताया- "जवाई बांध में जलस्तर कम होने के कारण 125.42 करोड़ रुपये का कंटीजेंसी प्लान भेजा गया है। इसके तहत 367 गांवों में टैंकरों से पानी पहुंचाने, गांवों में 192 और शहरों में 41 नए बोरवेल खोदने का प्रस्ताव है। जरूरत पड़ने पर माइंस के गड्ढों से भी पानी निकालकर सप्लाई करना पड़ेगा।" जोधपुर से 66 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाने का काम भी चल रहा है, जिस पर 155 करोड़ रुपये खर्च होने हैं, लेकिन धीमी गति के कारण फिलहाल कुड़ी से रोहट तक की लाइन से मात्र 10 एमएलडी पानी ही मिल पा रहा है, जबकि मांग 30 एमएलडी की है।
झुंझुनूं में 1100 फीट नीचे गया भूजल स्तर
पाली के अलावा झुंझुनूं जिले के चिड़ावा और पिलानी में भी भूजल स्तर खतरनाक स्तर तक गिर चुका है। यहां कई इलाकों में पानी 800 से 1100 फीट गहराई तक चला गया है। चिड़ावा में करीब 150 ट्यूबवेल होने के बावजूद भूजल के खारेपन और जर्जर हो चुकी दशकों पुरानी पाइपलाइनों के कारण लोगों को पर्याप्त जलापूर्ति नहीं मिल पा रही है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस संकट से निपटने के लिए यमुना जल के स्थायी समाधान का इंतजार है, तब तक ट्यूबवेलों के सहारे ही काम चलाया जा रहा है।
प्रदेश के बांधों में पिछले साल से 28% कम पानी
जल संसाधन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, राजस्थान के 693 बांधों की कुल जल संग्रहण क्षमता 13,029.09 मिलियन क्यूबिक मीटर है। 30 सितंबर तक के रिकॉर्ड के अनुसार इनमें 8,098.46 मिलियन क्यूबिक मीटर यानी कुल क्षमता का 62.16% पानी ही बचा है। पिछले साल इसी अवधि में बांध 90.19% तक भरे हुए थे, यानी इस बार जल भंडार में 28 फीसदी की गिरावट आई है।
स्टेट और जिला एक्शन प्लान के निर्देश
आगामी गर्मियों और मौजूदा संकट से निपटने के लिए मुख्य सचिव ने सभी जिलों में स्टेट और डिस्ट्रिक्ट एक्शन प्लान तैयार करने के निर्देश दिए हैं। पीएचईडी के चीफ इंजीनियर देवराज सोलंकी के अनुसार, इंदिरा गांधी नहर परियोजना क्षेत्र के जिलों के लिए अलग से जल वितरण नीति बनाई जा रही है। हर जिले की स्थानीय भौगोलिक स्थिति और पेयजल जरूरतों के आधार पर आपातकालीन कार्ययोजना को अंतिम रूप दिया जा रहा है।
