राज्य में शहरी निकाय चुनावों के परिणाम सामने आने के बाद अब राजनीतिक दलों का पूरा फोकस ग्रामीण क्षेत्रों की ओर शिफ्ट हो गया है। पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव की आधिकारिक घोषणा भले ही अभी बाकी हो, लेकिन भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने बूथ स्तर तक अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। दोनों प्रमुख दलों की सक्रियता से साफ है कि आगामी पंचायत चुनाव केवल स्थानीय नेतृत्व चुनने की कवायद नहीं होंगे, बल्कि प्रदेश की ग्रामीण राजनीतिक दिशा तय करने में भी अहम भूमिका निभाएंगे।
संगठन को हथियार बना रही बीजेपी, 19 जिलों का दौरा
सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने पंचायत चुनावों के मद्देनजर अपने सांगठनिक ढांचे को सबसे बड़ा जरिया बनाया है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कम समय में राज्य के 19 जिलों का दौरा कर अपनी रणनीति के संकेत दे दिए हैं। बकानेर, श्रीगंगानगर, भरतपुर, ब्यावर, खैरथल-तिजारा, कोटा, झालावाड़, अजमेर, बाड़मेर, जैसलमेर, बालोतरा, पाली, जालौर, सिरोही, जोधपुर, फलोदी, सीकर, चूरू और झुंझुनूं जैसे जिलों में इन दौरों के दौरान विकास कार्यों के लोकार्पण और शिलान्यास के साथ कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद भी साधा गया।
इन दौरों को केवल प्रशासनिक गतिविधियां नहीं माना जा सकता। इसके जरिए पार्टी ग्रामीण इलाकों में संगठन की जमीनी स्थिति, स्थानीय असंतोष, संभावित उम्मीदवारों और जातीय समीकरणों का आकलन कर रही है। प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ समेत पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने भी अलग-अलग जिलों में मोर्चा संभाल रखा है। राजस्थान प्रभारी राधा मोहन दास अग्रवाल और सह प्रभारी विजया राहटकर की बैठकें यह बताती हैं कि पार्टी पंचायत स्तर तक चुनाव प्रबंधन को पुख्ता करना चाहती है।
जमीनी सवालों से पार पाने की चुनौती
सत्ता में होने के नाते बीजेपी के सामने ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार के कामकाज को लेकर उठने वाले सवालों का सामना करने की भी चुनौती है। पंचायत चुनावों में राष्ट्रीय या बड़े राजनीतिक मुद्दों के मुकाबले स्थानीय मुद्दे ज्यादा प्रभावी साबित होते हैं। सड़क, बिजली, पानी, रोजगार, कृषि से जुड़ी दिक्कतें और स्थानीय उम्मीदवारों की स्वीकार्यता सीधे तौर पर नतीजों को प्रभावित करती है।
दूसरी तरफ, कांग्रेस ने पिछले निकाय चुनावों से सबक लेते हुए अपनी रणनीति को अधिक आक्रामक बनाने का रुख अपनाया है। पार्टी ने चुनाव की औपचारिक घोषणा का इंतजार किए बिना ही जिला और संभाग स्तर पर बड़े आयोजनों का सिलसिला शुरू कर दिया है।
कांग्रेस का आक्रामक रुख और सांगठनिक चुनौतियां
नागौर के डेगाना से शुरू हुई राजनीतिक गतिविधियों के बाद बीकानेर में शक्ति प्रदर्शन और चार चरणों में प्रस्तावित सभाओं का खाका यह साफ करता है कि कांग्रेस इस बार संगठन को सुस्त नहीं रहने देना चाहती। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, सचिन पायलट और प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा जैसे वरिष्ठ नेता लगातार कार्यकर्ताओं के संपर्क में हैं।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी परीक्षा केवल भीड़ जुटाने से आगे की होगी। पार्टी को स्थानीय स्तर पर मजबूत चेहरों का चयन करने, अंदरूनी गुटबाजी पर काबू पाने और प्रभावशाली नेताओं को एक मंच पर लाने की चुनौती से निपटना होगा। ग्रामीण राजनीति में कई बार पार्टी के चुनाव चिह्न से ज्यादा उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ निर्णायक साबित होती है।
जातीय समीकरण और क्षेत्रीय प्रभाव तय करेंगे दिशा
राजस्थान के पंचायत चुनावों को केवल बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला मान लेना अधूरा आकलन होगा। जमीनी स्तर पर जातीय समीकरण, निर्दलीय प्रत्याशी, क्षेत्रीय प्रभाव वाले नेता और व्यक्तिगत रिश्ते भी नतीजों की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।
बीजपी जहां अपने सांगठनिक नेटवर्क और सत्ता के प्रभाव को ग्रामीण विस्तार देना चाहती है, वहीं कांग्रेस सरकार के खिलाफ संभावित स्थानीय असंतोष को भुनाने की जुगत में है। मदन राठौड़ का दावा है कि केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं तथा मजबूत संगठन के बूते ग्रामीण मतदाता पार्टी के साथ खड़े रहेंगे। इसके उलट, गोविंद सिंह डोटासरा सरकार के खिलाफ गांवों में नाराजगी का दावा कर रहे हैं।
इन दोनों दावों की वास्तविक परख पंचायत चुनाव के परिणामों में ही होगी। चूंकि ये चुनाव स्थानीय समस्याओं और प्रत्याशी की व्यक्तिगत छवि पर ज्यादा निर्भर करते हैं, इसलिए छोटे-छोटे समीकरण भी बड़ा राजनीतिक संदेश देने की क्षमता रखते हैं।
