मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ निकाले गए मार्च के दौरान राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की अध्यक्ष नेहा बोरा के अग्रिम पंक्ति में नजर आने से राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। कांग्रेस नेताओं के साथ उनकी इस कदमताल को लेकर विपक्षी खेमे में अटकलों का बाजार गर्म है, खासकर उनके कॉकरोच जनता पार्टी से पुराने जुड़ाव को देखते हुए।
जुलाई में कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले हुए विरोध प्रदर्शन में नेहा बोरा एक प्रमुख चेहरे के तौर पर शामिल रही थीं। ऐसे में इस मार्च के दौरान राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ उनका आगे चलना युवा आंदोलनों और विपक्षी राजनीति के बदलते समीकरणों की ओर इशारा करता है। इस दौरान राहुल गांधी ने कई मौकों पर नेहा बोरा और प्रियंका गांधी के कंधों पर हाथ भी रखा, जिसे राजनीतिक और प्रतीकात्मक दोनों दृष्टियों से अहम माना जा रहा है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि इस एक घटना के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि उन्होंने अपने पुराने संगठन से किनारा कर लिया है या कांग्रेस ने उस आंदोलन में सेंध लगा दी है।
युवा आंदोलनों का राजनीतिक गणित और कांग्रेस का रुख
राजनीतिक दलों के लिए नए और युवा आंदोलनों का असर समझना नया नहीं है। साल 2012 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से उपजी आम आदमी पार्टी ने जिस तरह दिल्ली की सियासत में कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक को चुनौती दी थी, उसने स्थापित दलों की चिंताएं बढ़ा दी थीं। यही वजह है कि कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को मिल रहे युवा समर्थन पर भी राजनीतिक विश्लेषकों की नजर टिकी हुई है।
सोशल मीडिया, छात्र संगठनों और नागरिक सक्रियता के बूते पहचान बनाने वाले ऐसे समूह भविष्य में बड़ा सियासी असर पैदा कर सकते हैं। यही कारण है कि कांग्रेस के लिए युवाओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करना और नए चेहरों को मंच देना रणनीतिक तौर पर अहम माना जा रहा है। हालांकि, 'आप' के उभार और मौजूदा आंदोलन के बीच सीधी तुलना करना अभी जल्दबाजी होगी, क्योंकि दोनों की कार्यशैली और सांगठनिक परिस्थितियां पूरी तरह अलग हैं।
डिजिटल लोकप्रियता बनाम जमीनी संगठन की चुनौती
कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़े अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास जैसे चेहरे लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस और सार्वजनिक गतिविधियों के जरिए राजनीतिक विमर्श में बने रहने की कोशिश कर रहे हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से समर्थन जुटाना और छात्र संगठनों तक पहुंच बनाना किसी भी नए समूह के लिए दायरा बढ़ाने का जरिया तो है, लेकिन डिजिटल लोकप्रियता को स्थायी जनसमर्थन में बदलना चुनौती भरा होता है। इसके लिए स्पष्ट वैचारिक दिशा और जमीनी सक्रियता की लंबी दरकार होती है।
फिलहाल इस मार्च ने युवा राजनीति और विपक्षी रणनीति पर नए सिरे से बहस जरूर छेड़ दी है। यह घटना कांग्रेस की संभावित राजनीतिक सतर्कता का संकेत तो देती है, लेकिन इसे किसी बड़े राजनीतिक फेरबदल का पक्का प्रमाण नहीं माना जा सकता। आने वाले दिनों में नेहा बोरा की आगे की गतिविधियों और कॉकरोच जनता पार्टी के रुख से ही यह साफ हो पाएगा कि यह मेलजोल महज एक साझा विरोध तक सीमित था या इसके गहरे सियासी मायने हैं।
