रविवार, 23 अगस्त को सावन शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा जा रहा है। यह व्रत मुख्य रूप से संतान प्राप्ति, संतान की उन्नति और उनके उज्जवल भविष्य की कामना के लिए किया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, साल में दो बार पुत्रदा एकादशी आती है—एक सावन मास में और दूसरी पौष मास में। सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित है, जबकि एकादशी तिथि भगवान विष्णु की आराधना के लिए खास मानी जाती है। इस संयोग के चलते सावन मास की एकादशी का धार्मिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, इस व्रत के प्रभाव से उत्तम संतान की प्राप्ति होती है और परिवार में सकारात्मकता बनी रहती है। माता-पिता अपनी संतान की सफलता के लिए भी यह अनुष्ठान करते हैं।
दशमी तिथि से शुरू होती हैं तैयारियां
पुत्रदा एकादशी के नियमों की शुरुआत एक दिन पहले दशमी तिथि से ही हो जाती है। व्रत रखने वाले को दशमी की शाम को सात्विक और हल्का भोजन करना चाहिए तथा तामसिक आहार से पूरी तरह दूरी रखनी चाहिए।
एकादशी की सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर घर के मंदिर की सफाई करें। इसके बाद भगवान विष्णु और शिव का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
पूजन सामग्री और नियम
विष्णु और शिव की इस संयुक्त पूजा में धूप, दीप, फूल-माला, बिल्व पत्र, आंकड़े के फूल, धतूरा, चावल, रोली और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। विष्णु पूजन में तुलसी दल का होना अनिवार्य माना गया है, हालांकि शिव पूजा में तुलसी का प्रयोग वर्जित है। पूजा के अंत में कथा सुनना और आरती करना जरूरी होता है।
दिनभर अपनी क्षमता के अनुसार निराहार या फलाहार रहकर व्रत का पालन करें। इस दौरान मन को शांत रखकर ईश्वर का स्मरण करना चाहिए। शाम के वक्त भी विधि-विधान से दीपक जलाकर भगवान की आराधना की जाती है।
द्वादशी पर ऐसे खोलें व्रत
व्रत का समापन द्वादशी तिथि यानी अगले दिन सुबह स्नान के बाद किया जाता है। भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना के बाद व्रत पूरा होने की प्रार्थना की जाती है। परंपरा के अनुसार, जरूरतमंदों को अन्न या वस्त्र का दान करने के बाद ही स्वयं भोजन ग्रहण किया जाता है।
नदी स्नान और दीपदान का महत्व
पुत्रदा एकादशी पर पवित्र नदियों या जलाशयों में स्नान का विशेष पुण्य माना गया है। स्नान के बाद जल में दीपदान करने की परंपरा है। यदि किसी वजह से नदी पर जाना संभव न हो, तो घर के नहाने वाले पानी में ही थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्नान किया जा सकता है। इसके बाद घर पर ही दीपदान और दान-पुण्य करने से व्रत का पूरा फल प्राप्त होता है।
