देश में वैवाहिक बलात्कार यानी मैरिटल रेप को अपराध के दायरे में लाने और इससे जुड़े मौजूदा कानूनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जल्द सुनवाई शुरू होने वाली है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच तीन हफ्ते बाद इस मामले से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। सुनवाई से पहले बेंच ने स्पष्ट किया है कि पीड़ितों के संरक्षण के लिए कानून की नए सिरे से समीक्षा का वक्त आ गया है, जबकि केंद्र सरकार ने अदालत को याद दिलाया है कि इस पर कानून बनाने का अधिकार संसद के पास है।
दो मुख्य कानूनी सवालों पर फोकस
महिलाओं के संगठनों के लंबे संघर्ष और दबाव के बावजूद भारत में मैरिटल रेप को अब तक अपराध घोषित नहीं किया गया है। भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63 (पुराने आईपीसी की धारा 375 का दूसरा अपवाद) के तहत इसे बलात्कार की परिभाषा से बाहर रखा गया है।
केंद्र सरकार के रुख और कानूनी सीमाओं को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सुनवाई का दायरा तय कर दिया है। अदालत मुख्य रूप से दो बिंदुओं पर विचार करेगी:
- क्या मैरिटल रेप अपवाद के बावजूद किसी पति पर आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है?
- क्या कानून में दिया गया यह अपवाद संवैधानिक रूप से वैध है?
सुनवाई के दौरान बेंच ने टिप्पणी की कि शादी के बाद भी किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वायत्तता खत्म नहीं हो सकती। अदालत ने कहा, " involuntary sexual intercourse (अनिच्छुक यौन संबंध) की शिकार महिला निश्चित रूप से पीड़ित है। हम पीड़ितों की रक्षा करेंगे। सवाल यह है कि क्या राज्य इसे बलात्कार के रूप में परिभाषित करता है और क्या यह अपवाद अभी भी कानून का हिस्सा है?"
कोर्ट की सीमाएं और बेंच की टिप्पणियां
मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस जॉयमल्या बागची ने स्पष्ट किया कि जब तक अदालत इस अपवाद की 'संवैधानिक वैधता' पर फैसला नहीं लेती, तब तक अभियोजन चलाना संभव नहीं है। उन्होंने कहा, "हमारे सामने सवाल यह है कि ऐसे पीड़ित की स्थिति के बावजूद, क्या राज्य इसे बलात्कार के रूप में परिभाषित करता है या नहीं। यदि गंभीर चोट या नुकसान पहुंचाया जाता है, तो अन्य कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। अगर आरोपी ने गंभीर चोट या मौत पहुंचाई है, तो यह अपवाद उसे नहीं बचाता।"
इसके साथ ही उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आपराधिक मंशा (Mens Rea), जवाबदेही और संविधान की ऐसी व्याख्या पर विचार करना जरूरी है जिससे नागरिकों के लिए अचानक कोई नया कानूनी संकट खड़ा न हो।
केंद्र सरकार का पक्ष: यह संसद का काम
केंद्र सरकार की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल एसजी मेहता ने अदालत में कड़ा रुख अपनाते हुए दलील दी कि मैरिटल रेप को अपराध घोषित करना न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। उन्होंने कहा कि यह काम विधायिका और कार्यपालिका का है, कोर्ट का नहीं।
सरकार ने अपने हलफनामे में कहा है कि भारत को पश्चिमी देशों की देखा-सीखी इस कानून को नहीं अपनाना चाहिए, क्योंकि देश की सामाजिक संरचना और परिस्थितियां पूरी तरह अलग हैं। सरकार का मानना है कि मैरिटल रेप को अपराध बनाने से विवाह की संस्था प्रभावित हो सकती है और इसके गहरे सामाजिक परिणाम हो सकते हैं।
कानून का इतिहास और अंतरराष्ट्रीय स्थिति
वर्तमान में दुनिया के 130 से अधिक देशों में मैरिटल रेप को अपराध माना जा चुका है, जहां यह स्पष्ट किया गया है कि शादी का मतलब यौन हिंसा की छूट नहीं है। इसके विपरीत, भारत में ब्रिटिश काल का यह नियम आज भी बरकरार है। संयुक्त राष्ट्र समेत कई अंतरराष्ट्रीय संगठन भारत से इस औपनिवेशिक अपवाद को हटाने की मांग कर चुके हैं, जिसे महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता के अधिकार के खिलाफ माना जाता है।
इस मामले की कानूनी लड़ाई लंबी रही है। साल 2015 में सबसे पहले दिल्ली हाईकोर्ट में मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने की मांग को लेकर याचिकाएं दायर की गई थीं। इसके बाद 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट ने इस पर एक खंडित (split) फैसला सुनाया था, जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।
