कहते हैं मां की ममता के आगे हर मुश्किल छोटी पड़ जाती है। शहडोल जिले से सामने आई एक तस्वीर इस कहावत को सच साबित कर रही है। यहां एक मां अपने 80 प्रतिशत दिव्यांग बेटे को पढ़ाने के लिए रोज अपनी पीठ को ही उसकी बैसाखी बना रही है। बेटे के पैरों ने साथ छोड़ा तो मां ने उसके सपनों को सहारा देने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली।
दिव्यांग चलने फिरने में असमर्थ
मामला झींक बिजुरी क्षेत्र के दर्शीला गांव का है। यहां फूल कुमारी अपने बेटे राजकुमार जायसवाल के साथ रहती हैं। राजकुमार कक्षा 12वीं आर्ट्स का छात्र है और शारीरिक रूप से दिव्यांग होने के कारण चलने-फिरने में असमर्थ है। उसका स्कूल दर्शीला से करीब 10 से 15 किलोमीटर दूर शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय झींक बिजुरी में है।
बेटे को पीठ पर लेकर स्कूल जाती मां
फूल कुमारी रोज बेटे को पीठ पर बैठाकर दर्शीला से बिलटिकुरी बस स्टैंड तक लाती हैं। इसके बाद बस से झींक बिजुरी पहुंचती हैं और वहां से करीब एक किलोमीटर का रास्ता भी बेटे को पीठ पर लेकर स्कूल तक तय करती हैं। मां पूरे दिन बेटे के साथ रहती हैं, जिसके कारण मजदूरी भी नहीं कर पातीं।
परिवार में मां और बेटा ही हैं। उन्हें पांच किलो प्रति व्यक्ति के हिसाब से राशन मिलता है। फूल कुमारी ने 35 किलो राशन देने की मांग की है। वहीं राजकुमार को अब तक स्कूल से कोई सहायता नहीं मिली है। परिवार ने शासन-प्रशासन से इलेक्ट्रिक ट्राईसाइकिल दिलाने की मांग की है, ताकि वह बिना सहारे स्कूल जा सके।
