डिजिटल पेमेंट की तस्वीर बदलने वाले यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) पर अगले साल से मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू होने जा रहा है। सरकार और केंद्रीय भुगतान प्राधिकरण के इस फैसले के तहत, 15 अक्टूबर 2026 से 2,000 रुपये से अधिक के मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर 0.4% (40 बेसिस पॉइंट) का शुल्क वसूला जाएगा। हालांकि, आम नागरिकों के बीच होने वाले पर्सन-टू-पर्सन (P2P) ट्रांसफर पूरी तरह मुफ्त बने रहेंगे।
पिछले छह साल से बिना किसी शुल्क के चल रहे इस डिजिटल पेमेंट नेटवर्क पर MDR वापसी से बैंकों और पेमेंट फर्मों के लिए नई कमाई का रास्ता खुलेगा। फैसले की घोषणा के बाद बुधवार को भारतीय पेमेंट कंपनियों के शेयरों में तेजी दर्ज की गई।
MDR शुल्क का गणित और छूट के दायरे
नए नियमों के मुताबिक, 0.4% का यह शुल्क केवल 2,000 रुपये से ज्यादा के व्यावसायिक भुगतानों पर लागू होगा। छोटे व्यापारियों, ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में काम करने वाले दुकानदारों को इस दायरे से बाहर रखा गया है।
इसके अलावा, टेलीकॉम, रेलवे, म्यूचुअल फंड और शेयर बाजार से जुड़े निवेश जैसे क्षेत्रों में कम शुल्क लागू किया जाएगा। 75,000 रुपये से अधिक के ट्रांजैक्शन पर शुल्क की अधिकतम सीमा (कैप) 300 रुपये तय की गई है। नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन (NPCI) ने साफ किया है कि मर्चेंट सीधे तौर पर ग्राहकों से यह शुल्क वसूल नहीं सकेंगे, लेकिन आलोचकों और जानकारों का मानना है कि दुकानदार इस लागत को किसी न किसी रूप में ग्राहकों पर डाल सकते हैं।
UPI का विशाल दायरा और बाजार हिस्सेदारी
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, यूपीआई का दायरा लगातार बढ़ रहा है। अकेले अगस्त महीने में यूपीआई के जरिए 29,823 अरब रुपये के 24.5 अरब ट्रांजैक्शन किए गए, जिनका इस्तेमाल 55 करोड़ से अधिक यूजर्स ने किया।
देश के कुल डिजिटल पेमेंट में वॉल्यूम के लिहाज से यूपीआई की हिस्सेदारी 84% है, जबकि वैश्विक रियल-टाइम पेमेंट वॉल्यूम में इसकी हिस्सेदारी 49% है। अगस्त के आंकड़ों के अनुसार, वॉल्यूमेट्रिक वैल्यू के हिसाब से वॉलमार्ट समर्थित PhonePe और अल्फाबेट के Google Pay की यूपीआई ट्रांजैक्शन में करीब 80% हिस्सेदारी है।
कब और कैसे शुरू हुआ था जीरो-MDR का दौर?
2016 में यूपीआई की शुरुआत के वक्त इसका प्राइसिंग मॉडल अलग था, जिसमें सामान्य शुल्क का प्रावधान था। हालांकि, 2017 में बड़े नोटों की बंदी (डिमोनिटाइजेशन) के बाद इन शुल्कों को अस्थायी रूप से हटा दिया गया था।
साल 2020 में सभी तरह के शुल्कों को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया, जिससे देश में जीरो-MDR का दौर शुरू हुआ। अब छह साल बाद, 15 अक्टूबर 2026 से यह मुफ्त दौर समाप्त हो जाएगा। बर्नस्टीन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस कदम से वित्त वर्ष 2028 तक 22,000 करोड़ रुपये का नया रेवेन्यू पूल तैयार हो सकता है।
राजनीतिक विरोध और सरकार का पक्ष
सरकार के इस फैसले पर राजनीतिक हलकों में प्रतिक्रियाएं शुरू हो गई हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सरकार के कदम की आलोचना करते हुए कहा है कि शुल्क लगने से मर्चेंट लागत ग्राहकों पर डालेंगे, जिससे आम जनता पर बोझ बढ़ेगा। सोशल मीडिया पर भी कई यूजर्स ने चिंता जताई है कि शुल्क लगने के बाद दुकानदार डिजिटल पेमेंट के बजाय फिर से नकद लेन-देन को प्राथमिकता दे सकते हैं।
दूसरी ओर, सरकार, केंद्रीय बैंक और पेमेंट अथॉरिटी का तर्क है कि MDR लागू होने से यूपीआई नेटवर्क आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनेगा। इससे ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में नेटवर्क के विस्तार को गति मिलेगी, जबकि अधिकांश भुगतान पहले की तरह मुफ्त बने रहेंगे।
