मालवा की सांस्कृतिक पहचान और सबसे पुरानी लोक परंपराओं में शुमार संजा पर्व अब आधुनिकता की दौड़ में धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा है। पितृपक्ष के 16 दिनों तक कभी गांवों और शहरों के घर-घर में गूंजने वाले संजा के पारंपरिक गीत और दीवारों पर गोबर से उकेरे जाने वाले सुंदर मांडने अब इक्का-दुक्का जगहों पर ही सिमटकर रह गए हैं।
पितृपक्ष के 16 दिनों तक रहती थी रौनक
पितृपक्ष की अवधि में मनाए जाने वाले संजा पर्व का उल्लास किसी बड़े उत्सव से कम नहीं होता था। शाम ढलते ही छोटी-छोटी बच्चियां अपने मोहल्लों में जुटती थीं और गोबर की मदद से दीवारों पर तरह-तरह की आकृतियां तैयार करती थीं। इनमें गणेश, चांद-सूरज, बिजौरा, घेवर, चौपड़, छाबड़ी, स्वस्तिक, अठफूल, डोकरा-डोकरी, केले का पेड़ और मोर-मोरनी जैसे मांडने प्रमुख होते थे। पर्व के अंतिम दिनों में मिट्टी और गोबर से किलाकोट बनाया जाता था, जो इसका मुख्य आकर्षण होता था।
मांडने गढ़ने के बाद बच्चियां समूह में बैठकर पारंपरिक गीत गाती थीं, आरती करती थीं और प्रसाद बांटती थीं। लोक मान्यताओं के अनुसार इन गीतों में संजा को सखी, बेटी और नववधू के रूप में चित्रित किया जाता था। उसके मायके आगमन, श्रृंगार, विवाह और ससुराल विदाई की लोक कल्पनाएं इन गीतों के जरिए जीवंत हो उठती थीं। कुंवारी कन्याएं मंगलकारी संजा की आराधना कर अच्छे भविष्य की कामना करती थीं।
साधारण सामग्री और कला का मेल
इस पर्व की विशेषता यह थी कि इसके लिए किसी महंगी सामग्री की आवश्यकता नहीं होती थी। गोबर, फूल, पत्तियां, हल्दी, कुमकुम, आटा और घर में मौजूद मामूली चीजों से ही दीवारों पर अद्भुत कलाकृतियां उकेर दी जाती थीं।
यह परंपरा बच्चों को न केवल अपनी कला और लोक संस्कृति से जोड़ती थी, बल्कि उनमें सामूहिक रूप से काम करने और आपसी मेल-जोल की भावना भी जगाती थी। घरों की दीवारों पर सजे मांडने और गलियों में सुनाई देने वाले संजा के गीत पूरे मालवा क्षेत्र के जनजीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करते थे।
आधुनिक जीवनशैली और घटता दायरा
बदलती जीवनशैली, संयुक्त परिवारों के विघटन और मोबाइल-डिजिटल मनोरंजन के बढ़ते चलन ने इस लोक परंपरा पर गहरा असर डाला है। जहां पहले 16 दिनों तक हर घर में संजा की धूम रहती थी, वहीं अब कई गांवों और शहरों में इस नाम का भी कोई जिक्र नहीं बचा है।
कुछ गिने-चुने स्थानों पर अब दीवारों पर गोबर से मांडने बनाने के बजाय कागज या अन्य कृत्रिम सामग्रियों का इस्तेमाल होने लगा है। मालवा की इस प्राचीन लोक विरासत का इस तरह सिमट जाना क्षेत्र के सांस्कृतिक इतिहास के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है।
लोक विरासत को सहेजने की चुनौती
संजा केवल धार्मिक या सांस्कृतिक कर्मकांड तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मालवा की लोककला, पारंपरिक गीतों और सामाजिक ताने-बाने की पहचान है। इसके संरक्षण के लिए परिवारों को आगे आकर नई पीढ़ी को इससे जोड़ना होगा।
स्कूलों, सांस्कृतिक संगठनों और सामाजिक संस्थाओं के स्तर पर मांडना प्रतियोगिताओं और लोकगीत कार्यक्रमों का आयोजन कर इस धरोहर को बचाया जा सकता है। यदि समय रहते सुनियोजित प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले समय में मालवा की यह समृद्ध परंपरा केवल किस्से-कहानियों तक ही सीमित रह जाएगी।
