छिंदवाड़ा
 जहां एक ओर लोग बीमार, घायल और बेसहारा कुत्तों को सड़कों पर छोड़ देते हैं, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इन बेजुबान जीवों को अपनाकर उन्हें नई जिंदगी देने का काम कर रहे हैं। छिंदवाड़ा की मोहिनी भारती ऐसी ही एक मिसाल हैं, जिन्होंने पशु सेवा को अपना जीवन समर्पित कर दिया है।मोहिनी भारती वर्ष 2012 से लगातार कुत्तों की सेवा और देखभाल कर रही हैं। उन्होंने अब तक लगभग 100 से 150 बीमार, घायल और बेसहारा कुत्तों का उपचार, पालन-पोषण और संरक्षण किया है। वर्तमान में उनके पास 18 से 20 कुत्ते हैं, जिनकी देखभाल वह अपने परिवार के सदस्य की तरह करती हैं।मोहिनी बताती हैं कि कुत्तों के प्रति उनका लगाव इतना अधिक है कि उन्होंने उनकी देखभाल के लिए अपनी पढ़ाई तक छोड़ दी। उनका अधिकांश समय कुत्तों के साथ बीतता है। उन्हें खाना खिलाना, इलाज कराना, उनके साथ खेलना और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना ही उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है।सड़क पर घायल या बीमार अवस्था में मिलने वाले कुत्तों को वह अपने पास लाकर उनका उपचार कराती हैं और पूरी तरह स्वस्थ होने तक उनकी देखभाल करती हैं। कई बार आर्थिक और अन्य चुनौतियों का सामना करने के बावजूद उन्होंने अपनी सेवा का कार्य नहीं छोड़ा।मोहिनी भारती का यह समर्पण समाज के लिए प्रेरणादायक है। ऐसे समय में जब लोग अक्सर बेजुबान जानवरों की उपेक्षा कर देते हैं, मोहिनी उनकी सेवा कर मानवता और करुणा की मिसाल पेश कर रही हैं। उनका मानना है कि पशु भी प्रेम, सुरक्षा और देखभाल के हकदार हैं तथा समाज को उनके प्रति संवेदनशील होना चाहिए।मोहिनी की यह पहल न केवल पशु संरक्षण का उत्कृष्ट उदाहरण है, बल्कि यह संदेश भी देती है कि इंसानियत केवल मनुष्यों की सेवा तक सीमित नहीं है, बल्कि बेजुबान जीवों के प्रति दया और करुणा भी उसका महत्वपूर्ण हिस्सा हैमोहिनी भारती ने बताया, '' अभी मेरे पास 7 से 8 छोटे पप्पी हैं और 10 बड़े आवारा कुत्ते हैं, जिनका भरण पोषण और देखरेख करती हूं. हर दिन लगभग 20 लीटर दलिया बनाकर तैयार करती हूं और अलग-अलग कटोरों में उन्हें रोज सर्व करती हूं. ये बच्चे कई बार बीमार पड़ते हैं, तो इन्हें प्राइवेट हॉस्पिटल ले जाकर इलाकर करती हूं. कई बार इन्हें छोटे बच्चों की तरह बॉटल से दूध पिलाना पड़ता है.मोहिनी के पिता भगवान दास भारती ने बताया कि उनकी तीन बेटियां है जिसमें से ये छोटी बेटी है. वे कहते हैं, '' उसका यह निस्वार्थ भाव देखकर काफी गर्व महसूस होता है. आज के समय में लोग अपने निजी स्वार्थ के चलते रिश्तों की परवाह नहीं करते. वहीं, मेरी बेटी निस्वार्थ भाव से डॉग्स की सेवा में लगी है और अपने सभी निजी स्वार्थ को दरकिनार किया हुआ है. कई बार उसे लोगों की बहुत बातें भी सुनना पड़ती हैं पर वह सबकुछ सहते हुए 12 सालों से डॉग्स की सेवा कर रही है.