पांढुर्णा में जाम नदी के तट पर आज एक बार फिर ऐसा नजारा देखने को मिलेगा, जहां परंपरा के नाम पर एक-दूसरे पर पत्थरों की बरसात होती हैं। सिर फोड़ती गोफन, लहूलुहान होते लोग और नदी किनारे बिखरे पत्थर—सदियों पुरानी गोटमार मेले की यही पहचान बन चुकी है। इस खूनी परंपरा ने अब तक न जाने कितने परिवारों को अपनों से हमेशा के लिए दूर कर दिया है।
सावरगांव और पांढुर्ना के बीच में होता है यह खूनी खेल
पांढुर्णा और सावरगांव के बीच जाम नदी पर पोला पर्व के दूसरे दिन आयोजित होने वाले इस मेले में हजारों लोग शामिल होते हैं। मां चंडिका के पूजन और दर्शन के बाद खिलाड़ी गोटमार में हिस्सा लेते हैं। वर्ष 1955 से 2026 तक गोटमार में पत्थरबाजी के दौरान 14 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि बड़ी संख्या में लोग घायल हुए हैं।
पत्थरों से एक दूसरे के ऊपर बरसाया जाता है गोफन से पांढुरना
प्रशासन हर साल इस परंपरा को रोकने और पत्थरबाजी की जगह सुरक्षित तरीके अपनाने की कोशिश करता है, लेकिन परंपरा के नाम पर होने वाला यह आयोजन पूरी तरह बंद नहीं हो पाया। कभी रबर बॉल से गोटमार कराने का प्रयास भी हुआ, लेकिन कुछ ही देर में रबर बॉल गायब हुए और पत्थरों की बरसात फिर शुरू हो गई।
पांढुर्णा में विश्वप्रसिद्ध गोटमार मेला कल
इस मेले की शुरुआत को लेकर कई किवदंतियां प्रचलित हैं। एक कहानी में भोसला राजाओं के सैनिकों के युद्धाभ्यास को इसकी शुरुआत से जोड़ा जाता है, जबकि दूसरी लोकप्रिय मान्यता पांढुर्णा के युवक और सावरगांव की युवती की प्रेम कहानी से जुड़ी है। कहा जाता है कि प्रेमी युगल को रोकने के दौरान दोनों पक्षों में पत्थरबाजी हुई और इसी घटना के बाद गोटमार की परंपरा शुरू हुई।
पत्थरों की बरसात से लिखते है मोहब्बत की दास्तान
हालांकि बुजुर्गों का कहना है कि समय के साथ इस परंपरा का स्वरूप बदल गया है। गोफन, अवैध शराब और बढ़ती आक्रामकता ने मेले को पहले से ज्यादा खतरनाक बना दिया है।
इस बार भी प्रशासन ने शांति समिति की बैठक कर लोगों से शांतिपूर्ण तरीके से पर्व मनाने की अपील की है। मेले में कलेक्टर-एसपी सहित वरिष्ठ अधिकारी, करीब 700 पुलिसकर्मी, ड्रोन और सीसीटीवी कैमरों के जरिए निगरानी रखेंगे। चिकित्सा विभाग को भी अलर्ट रखा गया है। इसके बावजूद नदी के दोनों किनारों पर बड़ी मात्रा में पत्थरों के ढेर नजर आ रहे हैं।
जिला चिकित्सालय पांढुर्ना में भी पूरी तैयारी की गई है लगातार लगभग दो-तीन जिले की एंबुलेंस तैनात की गई है और जिला चिकित्सालय में भी एक वार्ड अलग ही बना दिया गया है
यानी प्रशासन की तमाम तैयारियों के बीच सवाल यही है—क्या इस बार भी पांढुर्णा की जाम नदी में परंपरा के नाम पर पत्थर बरसेंगे और खून बहेगा? क्योंकि इस बार भी 2 दिन पहले से ही मेला स्थल पर पत्थरों का जमावड़ा शुरू हो गया है और बड़ी संख्या में ट्रैक्टरों से पत्थर लाकर नदी के दोनों तरफ ही इकट्ठे किए जा रहे हैं जिसे देखकर ऐसा नहीं लगता कि इस बार मेले की आक्रामकता मैं कोई कमी होने वाली है ।
