बायतु विधायक और कांग्रेस के मध्य प्रदेश प्रभारी हरीश चौधरी ने बाड़मेर जिला कांग्रेस कार्यालय में आयोजित पत्रकार वार्ता के दौरान ग्रामीण विकास, नरेगा और पेयजल योजनाओं को लेकर सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि रेगिस्तानी जिलों की भौगोलिक वास्तविकताओं और पशुधन की जरूरतों को दरकिनार किए जाने से ग्रामीण क्षेत्रों में संकट गहरा रहा है।
नरेगा में घटती स्वीकृतियां और नवाचारों की उपेक्षा
नरेगा के संचालन को लेकर चौधरी ने आंकड़े सामने रखते हुए बताया कि वित्तीय वर्ष 2023-24 के दौरान जिले में लगभग 17,720 कार्य स्वीकृत किए गए थे, जबकि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में 2025-26 और 2026-27 के दौरान यह संख्या घटकर महज 7,317 रह गई है।
उन्होंने पूर्व के कार्यों का हवाला देते हुए कहा कि स्थानीय प्रयासों और मतदाताओं की सहभागिता से जिले में दो लाख से अधिक पानी के टांके बनाए गए, जो देश में किसी एक जिला परिषद के अंतर्गत सर्वाधिक हैं। इसके अलावा 1,523 किलोमीटर ग्रेवल सड़कें पूरी हुईं और करीब 2,000 सड़कें निर्माणाधीन रहीं। ऑनलाइन ई-फाइल सिस्टम जैसे नवाचारों के जरिए जिला परिषद ने पारदर्शिता के मामले में देश भर में बढ़त बनाई थी, लेकिन अब स्वीकृतियों में आई गिरावट से ग्रामीण रोजगार और विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं।
जल जीवन मिशन और पेयजल आपूर्ति पर सवाल
जल जीवन मिशन को लेकर उन्होंने केंद्र सरकार की एजेंसी WAPCOS के सर्वे पर गंभीर सवाल खड़े किए। चौधरी ने कहा कि मैदानी स्तर पर अधिकारियों के पहुंचे बिना ही योजनाएं तैयार कर करोड़ों रुपये का भुगतान कर दिया गया। उन्होंने कहा कि रेगिस्तानी इलाकों में मनुष्यों के साथ पशुओं की जल आवश्यकताएं भी उतनी ही जरूरी हैं, लेकिन सर्वे में इन वास्तविकताओं को नजरअंदाज किया गया।
उन्होंने पुरानी व्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा कि पहले NRDWP के तहत प्रति व्यक्ति 40 लीटर और पशुओं के लिए 30 लीटर पानी का प्रावधान था, जिसे अब संशोधित कर दिया गया है। बाड़मेर लिफ्ट पेयजल योजना के संदर्भ में उन्होंने बताया कि मोहनगढ़ पंप हाउसों पर वर्ष 2026 की मांग के अनुसार पंप लगाए गए थे, लेकिन वर्तमान में 140 MLD जरूरत के मुकाबले मात्र 100 MLD पानी की पंपिंग हो रही है। इसके साथ ही एक साल में महज 15-20 ट्यूबवेल और 25-30 हैंडपंप स्वीकृत होने से भूजल संकट और गहरा गया है।
अकाल राहत में देरी और चारे की बढ़ती कीमतें
सूखे और चारे के संकट पर चिंता जताते हुए चौधरी ने वर्ष 2000 के अकाल का उदाहरण दिया, जब 16 अगस्त से ही राहत कार्य शुरू कर दिए गए थे। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में चारे की कीमत 250-300 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़कर करीब 1,000 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच चुकी है, जिससे पशुपालक भारी परेशानी में हैं। उन्होंने तत्काल प्रभाव से पशु राहत शिविर शुरू करने, टैंकरों से जलापूर्ति करने और अकाल राहत कार्य शुरू कर रोजगार सृजन की मांग की।
परिसीमन में जनसंख्या असंतुलन का आरोप
पंचायतीराज संस्थाओं के परिसीमन पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि वार्डों के गठन में पारदर्शिता और जनसंख्या के संतुलन का ध्यान नहीं रखा गया। उन्होंने अपने वार्ड की जनसंख्या 6,216 होने का हवाला देते हुए बताया कि अन्य वार्डों में यह आंकड़ा 3,680 से लेकर 7,280 तक रखा गया है, जो प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करता है।
