बूंदी-चित्तौड़गढ़ मार्ग पर रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व के बफर जोन में स्थित ऐतिहासिक भीमलत बांध में रिसाव की समस्या गंभीर हो गई है। बांध की आर्च आकार की पक्की दीवार से लगातार पानी का रिसाव होने के कारण इसके टूटने की आशंका बढ़ गई है। सुरक्षा के मद्देनजर जल संसाधन विभाग ने बांध को पूरा भरने से पहले ही पानी की निकासी शुरू कर दी है।
1958 में निर्मित इस बांध की कुल भराव क्षमता 36 फीट है। वर्तमान में इसमें करीब 24 फीट पानी आ चुका है। सुरक्षा संगठन के निर्देशों के बाद पिछले तीन दिनों से धीमी गति से पानी निकाला जा रहा था, जिसे मानसून की गतिविधियों में तेजी आने के बाद मंगलवार से और बढ़ा दिया गया है।
असुरक्षित घोषित दीवार और सुरक्षा निर्देश
कुछ महीने पहले राज्य बांध सुरक्षा संगठन के एक दल ने भीमलत बांध का निरीक्षण किया था। टीम ने बांध की पक्की दीवार की जर्जर स्थिति को देखते हुए इसे असुरक्षित करार दिया था। संगठन ने जल संसाधन विभाग को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि इस साल बांध में 20 फीट से ज्यादा पानी का भराव नहीं किया जाए।
जल संसाधन विभाग के अधिशासी अभियंता प्रेमचंद मीणा ने बताया- "बांध की दीवार में रिसाव की समस्या और सुरक्षा संगठन के निर्देशों के तहत नीचे बसे ग्रामीणों की सुरक्षा सर्वोपरि है, इसलिए इस साल बांध को पूरा नहीं भरा जा रहा है।"
केंद्रीय जल आयोग को भेजा गया प्रस्ताव
भीमलत बांध की सुदृढ़ीकरण और मरम्मत के लिए जल संसाधन विभाग ने विस्तृत कार्य रिपोर्ट तैयार कर केंद्रीय जल आयोग को भेज दी है। आयोग से मंजूरी मिलने के बाद ही आगे की प्रक्रिया शुरू होगी।
मूल रूप से 1958 में मेवाड़ और हाड़ौती की सीमा पर इस बांध का निर्माण 4 लाख 58 हजार रुपये की लागत से किया गया था। अब इसकी दीवार और ढांचे की मरम्मत पर करीब 20 से 25 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। विभाग के अनुसार आगामी अक्टूबर तक टेंडर प्रक्रिया पूरी कर मरम्मत कार्य शुरू कराने का प्रयास किया जा रहा है।
कृषि भूमि और सिंचाई पर असर
ऊपरमाल के पठार और हाड़ौती के मैदानी इलाकों के संगम पर बने भीमलत बांध में अपनी कोई नहरी प्रणाली नहीं है। यहां से छोड़ा गया पानी तीन किलोमीटर लंबे नाले और भीमलत जलप्रपात के रास्ते नीचे बने अभयपुरा बांध में पहुंचता है, जहां से दो नहरें निकलती हैं।
इस जल तंत्र पर बूंदी पंचायत समिति के नीम का खेड़ा, मेघारावत की झोपड़ियां, मंगाल, गुढ़ानाथावतान, शाहपुरा और रामनगर पंचायत के दो दर्जन गांवों की करीब 3402 हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई निर्भर है। समय से पहले बांध खाली किए जाने के कारण इस साल रबी की फसलों की बुवाई के लिए पर्याप्त पानी मिलने को लेकर स्थानीय किसानों की चिंता बढ़ गई है।
