Tuesday, 20 October 2026
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दुधाखेड़ी माताजी मंदिर: पंचमुखी स्वरूप के दर्शन और मालवा के इस प्राचीन धाम का इतिहास

संक्षेप में

मंदसौर जिले के भानपुरा और गरोठ के बीच स्थित दुधाखेड़ी माताजी मंदिर अपने पंचमुखी स्वरूप, अखंड ज्योत और अहिल्याबाई होल्कर व होल्कर राजवंश से जुड़े ऐतिहासिक इतिहास के लिए मालवा अंचल में प्रसिद्ध है।

मुख्य बातें

  • मंदिर मंदसौर जिले के भानपुरा और गरोठ मार्ग के बीच स्थित है।
  • गर्भगृह में माता के पंचमुखी स्वरूप के दर्शन होते हैं।
  • लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था।
  • लगभग चार दशक पहले आकाशीय बिजली गिरने के बाद यहाँ पशुबलि की प्रथा बंद हो गई थी।
मध्य प्रदेश
दुधाखेड़ी माताजी मंदिर: पंचमुखी स्वरूप के दर्शन और मालवा के इस प्राचीन धाम का इतिहास

मंदसौर जिले के भानपुरा और गरोठ मार्ग के बीच स्थित दुधाखेड़ी माताजी का धाम मालवा, मेवाड़ और हाड़ौती अंचल की बड़ी धार्मिक पहचान है। नवरात्रि के इन दिनों में यहां मध्यप्रदेश और राजस्थान से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। माता के पंचमुखी स्वरूप और गर्भगृह में प्रज्वलित अखंड ज्योत से जुड़ी परंपराएं इस प्राचीन स्थल को खास बनाती हैं।

इतिहास के पन्नों में दर्ज है धाम का गौरव

यह मंदिर सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि अपनी ऐतिहासिक विरासत के लिए भी जाना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, इस धाम का संबंध प्राचीन नरेश मोरध्वज की आराधना परंपरा से जोड़ा जाता है। सदियों पुरानी इस परंपरा के बीच, लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर द्वारा मंदिर के जीर्णोद्धार का उल्लेख मिलता है।

परिसर में मौजूद चार खंभों वाली छतरी ऐतिहासिक महत्व रखती है। कोटा के झाला जालिम सिंह के साथ-साथ होल्कर और सिंधिया राजवंशों के शासकों द्वारा यहां धर्मशालाओं के निर्माण कराए जाने की परंपरा भी इतिहास में दर्ज है। इतिहास के जानकारों के अनुसार, महाराजा यशवंतराव होल्कर युद्ध पर रवाना होने से पहले दुधाखेड़ी माताजी के दरबार में हाजिरी लगाया करते थे।

दूध की धारा से जुड़ी नाम की लोककथा

इस धाम के 'दुधाखेड़ी' नाम के पीछे एक पुरानी लोककथा जुड़ी हुई है। बुजुर्गों के बीच प्रचलित कथा के मुताबिक, प्राचीन काल में दुधाजी रावत को माता ने स्वप्न में आकर अपना स्थान बदलने की इच्छा बताई थी। उस दौर में यह पूरा इलाका घना जंगल हुआ करता था।

कथा के अनुसार, जब एक व्यक्ति जंगल में पेड़ काट रहा था, तब उसे वन काटने से रोकने वाली एक रहस्यमयी आवाज सुनाई दी। इसके बाद वृद्धा के रूप में माता के प्रकट होने और वहां दूध की धारा बहने की बात कही जाती है। इसी मान्यता के आधार पर इस स्थान का नाम दुधाखेड़ी पड़ा, जो आज भी मंदिर की पहचान का मुख्य हिस्सा है।

पशुबलि की परंपरा का अंत और चमत्कारिक मान्यताएं

मंदिर से जुड़ी कई मान्यताएं और चमत्कारिक कथाएं श्रद्धालुओं के बीच गहरी आस्था रखती हैं। भक्त माता के दिव्य स्वरूप को शक्तिशाली मानते हुए शारीरिक और मानसिक कष्टों से राहत की मन्नत लेकर यहां पहुंचते हैं।

करीब चार दशक पहले मंदिर परिसर पर आकाशीय बिजली गिरने की एक घटना घटी थी, जिसके बाद यहां पीढ़ियों से चली आ रही पशुबलि की प्रथा पूरी तरह बंद हो गई। मौजूदा व्यवस्था के तहत मंदिर प्रबंधन की ओर से मुर्गा और बकरा अंकित चांदी के सिक्के प्रतीकात्मक भेंट के तौर पर दिए जाने की परंपरा निभाई जाती है।

नवरात्रि पर सजता है आस्था का विशाल मेला

चैत्र और शारदीय दोनों नवरात्रियों के दौरान दुधाखेड़ी माताजी धाम में भक्तों का तांता लगा रहता है। मध्यप्रदेश और राजस्थान के दूर-दराज के इलाकों से परिवार सहित श्रद्धालु माता के दर्शन करने पहुंचते हैं। विशेष पूजा-अर्चना और अखंड ज्योत के दर्शन के लिए उमड़ने वाली भीड़ से पूरा इलाका भक्तिमय हो जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

दुधाखेड़ी माताजी मंदिर कहाँ स्थित है?

दुधाखेड़ी माताजी मंदिर मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में भानपुरा और गरोठ मार्ग के बीच स्थित है।

मंदिर का नाम दुधाखेड़ी कैसे पड़ा?

लोककथा के अनुसार, माता के वृद्धा रूप में प्रकट होने और यहाँ दूध की धारा बहने की घटना के बाद इस स्थान का नाम दुधाखेड़ी पड़ा।

दुधाखेड़ी माताजी के मंदिर में कौन से स्वरूप के दर्शन होते हैं?

मंदिर के गर्भगृह में माता के पंचमुखी स्वरूप के दर्शन होते हैं, जिसके सामने अखंड ज्योत प्रज्वलित रहती है।

यहाँ पशुबलि की प्रथा कब बंद हुई?

लगभग चार दशक पहले आकाशीय बिजली गिरने की एक घटना के बाद यहाँ चली आ रही पशुबलि की परंपरा बंद हो गई थी।