राजस्थान में इस बार दक्षिण-पश्चिम मानसून की एंट्री को लेकर चिंताजनक संकेत मिलते नजर आ रहे हैं। मौसम विभाग के मुताबिक अल-नीनो प्रभाव के कारण मानसून की प्रगति सामान्य से काफी धीमी हो गई है और फिलहाल यह मुंबई से करीब 300 किलोमीटर दूर ही ठहरा हुआ है। पिछले 10 वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो मानसून आमतौर पर जून के दूसरे या तीसरे सप्ताह तक राजस्थान में दस्तक दे देता था, लेकिन इस बार इसके काफी देरी से पहुंचने की संभावना है। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रशांत महासागर में सक्रिय अल-नीनो के कारण मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ रही हैं, जिससे मानसून की गति प्रभावित हो रही है और बारिश की गतिविधियां भी सामान्य से कम रहने के संकेत मिल रहे हैं। मौसम विभाग पहले ही यह अनुमान जता चुका है कि जुलाई से सितंबर के बीच राजस्थान में सामान्य से कम वर्षा हो सकती है। विभाग के मुताबिक जून से सितंबर तक होने वाली कुल मानसूनी बारिश दीर्घकालीन औसत का करीब 92 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि 90 से 95 प्रतिशत के बीच की वर्षा को सामान्य से कम माना जाता है। मानसून की देरी और कम बारिश की आशंका के चलते प्रदेश के किसानों की चिंता बढ़ गयी है। राजस्थान में खरीफ फसलों की बुवाई बड़े पैमाने पर मानसूनी बारिश पर निर्भर रहती है। यदि मानसून समय पर नहीं पहुंचता या बारिश कम होती है तो बाजरा, मूंग, उड़द, सोयाबीन और अन्य खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हो सकती है। इससे उत्पादन में गिरावट आने और किसानों को आर्थिक नुकसान उठाने की आशंका भी बढ़ गई है। कृषि विशेषज्ञ मानते का है कि कमजोर मानसून का असर फसलों के रकबे और पैदावार दोनों पर पड़ सकता है। वहीं जलाशयों और बांधों में पानी की आवक भी कम रहने की संभावना है, जिसका असर पेयजल और सिंचाई व्यवस्था दोनों पर पड़ने की संभावना है।
