करीब 86 साल से कागजों और बैठकों में उलटी किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना आखिरकार अपने सबसे निर्णायक पड़ाव पर पहुंच गई है। मंगलवार को नई दिल्ली में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों ने किशाऊ परियोजना के औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस सहमति के साथ ही उत्तर भारत के छह राज्यों के बीच जल बंटवारे और लागत साझेदारी को लेकर दशकों से चला आ रहा गतिरोध खत्म हो गया है।

छह राज्यों के बीच बनी सहमति का ढांचा

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर बहने वाली टोंस नदी पर प्रस्तावित इस परियोजना की कुल अनुमानित लागत अब बढ़कर करीब 15,000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है। साल 2018 में यह लागत लगभग 11,550 करोड़ रुपये आंकी गई थी। निर्माण में देरी के चलते वित्तीय बोझ बढ़ा है, लेकिन केंद्र सरकार के हस्तक्षेप से वित्तीय मॉडल तय कर लिया गया है।

तय व्यवस्था के मुताबिक, परियोजना के जल घटक की कुल लागत का 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार केंद्रीय सहायता के रूप में वहन करेगी। शेष 10 प्रतिशत लागत छह राज्यों के बीच साझा की जाएगी। इस फॉर्मूले से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे पर्वतीय राज्यों पर भारी आर्थिक दबाव नहीं पड़ेगा।

पानी और बिजली का नया गणित

समझौते के तहत हिमाचल प्रदेश की विद्युत घटक में होने वाली हिस्सेदारी को लेकर एक विशेष अदला-बदली की व्यवस्था की गई है। इसके बदले हिमाचल को मिलने वाले पानी के कोटे में से दिल्ली और राजस्थान को पानी उपलब्ध कराया जाएगा। केंद्रीय जल आयोग और संबंधित मंत्रालयों का मानना है कि इस व्यवस्था से यमुना बेसिन में स्वच्छ जल प्रवाह बढ़ाने और पुनर्जीवन की कोशिशों को बल मिलेगा।

प्रस्तावित वितरण योजना के अनुसार, परियोजना से हरियाणा को 836 क्यूसेक, उत्तर प्रदेश को 543.2 क्यूसेक, राजस्थान को 163.52 क्यूसेक और दिल्ली को 105.28 क्यूसेक पानी मिलने का प्रावधान किया गया है। यही कारण है कि यह परियोजना केवल दो पहाड़ी राज्यों तक सीमित न रहकर उत्तर भारत के कई बड़े शहरी और कृषि क्षेत्रों की दीर्घकालिक जल सुरक्षा से जुड़ी है।

1940 में हुई थी पहली परिकल्पना

किशाऊ परियोजना का इतिहास स्वतंत्रता से भी पुराना है। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान 1940 में पहली बार इस क्षेत्र में एक बड़े बांध के निर्माण की परिकल्पना की गई थी। इसके बाद 1944-45 में तत्कालीन पंजाब सरकार ने शुरुआती सर्वेक्षण कराया, लेकिन 1946 में तकनीकी कारणों से काम रोक दिया गया।

सालों बाद 1962 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस प्रस्ताव को दोबारा उठाया और 1964 में लगभग 235 मीटर ऊंचे बांध की प्रारंभिक रिपोर्ट तैयार हुई। हालांकि, भू-वैज्ञानिक जांच के दौरान मूल स्थल पर एक प्रमुख फॉल्ट लाइन होने का पता चला, जिससे बांध की सुरक्षा पर बड़ा संकट खड़ा हो गया। इसके बाद केंद्रीय जल आयोग के निर्देश पर अटल, सांबरखेड़ा और मोहराड़ जैसे वैकल्पिक स्थलों का अध्ययन किया गया। अंततः विस्तृत परीक्षणों के बाद सांबरखेड़ा को उपयुक्त पाया गया और नई डीपीआर तैयार की गई।

2008 में राष्ट्रीय दर्जा और KCL का गठन

वर्ष 2008 में किशाऊ को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा मिलने के बावजूद वित्तीय और पर्यावरणीय मंजूरियों के पेंच फंसे रहे। सितंबर 2014 में प्रधानमंत्री कार्यालय में हुई उच्च स्तरीय बैठक के बाद इस अटकी हुई प्रक्रिया को नई गति मिली।

इसी क्रम में 16 जनवरी 2017 को उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश सरकारों के बीच 50:50 हिस्सेदारी के साथ किशाऊ कॉरपोरेशन लिमिटेड (KCL) का गठन किया गया। कंपनी को तकनीकी अध्ययन, डीपीआर और क्रियान्वयन की जिम्मेदारी सौंपी गई। छह राज्यों के बीच समझौता होने के बाद अब पर्यावरण, वन और अन्य वैधानिक मंजूरियों की अगली प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ाई जाएगी।

विस्थापन और पुनर्वास की बड़ी चुनौती

परियोजना के आर्थिक और जल सुरक्षा से जुड़े पहलुओं के बीच इसके सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। निर्माण कार्य शुरू होने से पहले उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कई गांवों के डूबने और बड़ी संख्या में परिवारों के विस्थापन की चुनौती सामने है। दोनों राज्यों की उपजाऊ और वन भूमि का एक बड़ा हिस्सा इसके दायरे में आएगा, जिसके चलते प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा, पुनर्वास और आजीविका सुनिश्चित करना प्रशासन के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता रहेगा।