हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल करवा चौथ का व्रत 29 अक्टूबर को रखा जाएगा। सुहागिन महिलाएं इस दिन अपने पति की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। सूर्योदय से पहले सरगी खाने के साथ शुरू होने वाला यह अनुष्ठान रात में चंद्रमा को अर्घ्य देने और पति के हाथों जल ग्रहण करने के बाद पूरा होता है। इस दिन सोलह शृंगार कर करवा माता की कथा सुनने का विधान है।
करवा के कलश में क्या-क्या सामग्री डाली जाती है?
करवा चौथ की पूजा में इस्तेमाल होने वाले करवे में जल भरना सबसे अहम चरण माना जाता है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों और पारिवारिक परंपराओं के मुताबिक इसकी सामग्री में थोड़ा बदलाव हो सकता है, लेकिन कुछ चीजें अनिवार्य मानी जाती हैं।
पूजा के कलश में जल, अक्षत, सिक्का, फूल और रोली मुख्य रूप से डाली जाती है। सबसे पहले करवे में शुद्ध जल भरा जाता है, क्योंकि इसी जल से रात को चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। इसके साथ ही भीतर थोड़े से साबुत चावल यानी अक्षत रखे जाते हैं। कई परिवारों में करवे के जल में एक सिक्का डालने का भी नियम है। इसके अलावा पूजा के दौरान फूलों और रोली का उपयोग किया जाता है।
पूजा का शुभ मुहूर्त और समय
करवा चौथ पर शाम के समय होने वाली पूजा के लिए पंचांग के अनुसार खास मुहूर्त तय किया गया है। इस साल पूजा का समय शाम 5 बजकर 38 मिनट से शुरू होकर शाम 6 बजकर 56 मिनट तक रहेगा।
इस अवधि में महिलाएं भगवान गणेश, शिव-पार्वती और करवा माता की विधि-विधान से पूजा करती हैं। इस दौरान करवा चौथ की कथा सुनने और परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करने की परंपरा है।
सरगी खाने की परंपरा और नियम
व्रत के दिन सुबह सास द्वारा दी जाने वाली सरगी का विशेष महत्व होता है। इसमें फल, मिठाइयां, सूखे मेवे और अन्य खाने-पीने की वस्तुएं शामिल होती हैं। कई घरों में सरगी के साथ कपड़े और शृंगार का सामान भी उपहार स्वरूप दिया जाता है। सरगी ग्रहण करने के बाद महिलाएं सूर्योदय से चंद्रोदय तक अन्न और जल का त्याग कर निर्जला उपवास रखती हैं।
