प्रदेश के 309 में से 162 शहरी निकायों में बुधवार को मतदान संपन्न हुआ। इन निकायों में औसतन 72% वोटिंग दर्ज की गई है, और कई जगहों पर पिछले चुनावों के रिकॉर्ड टूटे हैं। खास बात यह है कि इस बार राज्य में पहली बार सभी निकायों के चुनाव एक साथ एक ही चरण में कराए गए हैं, जबकि पिछली बार ये चुनाव चार अलग-अलग चरणों में हुए थे। मतदान के बाद राजनीतिक दलों और विश्लेषकों ने अलग-अलग जिलों में घटे और बढ़े मतदान प्रतिशत के अपने-अपने सियासी मायने निकालने शुरू कर दिए हैं।

भरतपुर और अलवर में कैसा रहा हाल

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह जिले भरतपुर नगर निगम में इस बार मतदान प्रतिशत में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यहां पिछली बार के 71.86% के मुकाबले इस बार 73.13% वोट पड़े। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, इस बार बीजेपी और कांग्रेस के अलावा आरएलडी और निर्दलीय फैक्टर भी सक्रिय रहे, जबकि दोनों मुख्य दलों ने रणनीति के तहत 8-8 सीटें खाली छोड़ी थीं। नवंबर 2019 के पिछले चुनावों में यहां कांग्रेस ने निर्दलीयों के समर्थन से बोर्ड बनाया था।

वहीं, अलवर नगर निगम में पिछली बार के मुकाबले मामूली बढ़त देखने को मिली। अलवर में इस बार 65.75% मतदान हुआ, जबकि पिछली बार यह आंकड़ा 65.36% था। स्थानीय मुद्दों को लेकर जनता में नाराजगी के बीच बीजेपी ने जहां मुख्यमंत्री के रोड शो और माइक्रो मैनेजमेंट के जरिए जोर लगाया, वहीं कांग्रेस की ओर से नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली और पूर्व राष्ट्रीय महासचिव जितेंद्र सिंह ने चुनाव प्रचार की कमान संभाली थी। अलवर के आसपास की नगरपालिकाओं में 84 से 86 फीसदी तक बंपर वोटिंग दर्ज की गई।

बीकानेर, झालावाड़ और नागौर के सियासी समीकरण

बीकानेर नगर निगम चुनावों में मतदान प्रतिशत 66.93% से बढ़कर 68.91% पहुंच गया है। बढ़े हुए आंकड़ों के बाद सत्ताधारी पार्टी और कांग्रेस दोनों ही अपनी जीत के दावे कर रहे हैं। चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने यहां रोड शो किया था और केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन मेघवाल ने लगातार कैंप किया था।

दूसरी तरफ, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के प्रभाव वाले झालावाड़ में मतदाताओं ने खासा उत्साह दिखाया। यहां 2021 के 75% के मुकाबले इस बार 78.16% वोट पड़े, जिससे पुराना सियासी ट्रेंड बरकरार रहने के कयास लगाए जा रहे हैं। नागौर नगर परिषद में भी पिछली बार के 80.90% से मतदान इस बार अधिक रहा, जहां 2021 में किसी दल को बहुमत नहीं मिला था और कांग्रेस ने निर्दलीयों के सहयोग से बोर्ड बनाया था।

चूरू और भीलवाड़ा में गिरे आंकड़े, बिगोद में रिकॉर्ड मतदान

बीजेपी के वरिष्ठ नेता राजेंद्र राठौड़ के गृह जिले चूरू की नगर परिषद में इस बार केवल 67% वोटिंग हुई, जो पिछली बार (74.30%) से करीब 7 फीसदी कम है। इस भारी गिरावट ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। हालांकि, चूरू जिले की अन्य पालिकाओं में 75% के आसपास मतदान हुआ है। भीलवाड़ा में भी पिछले चुनावों के मुकाबले वोटिंग 67.13% से घटकर 63.84% पर आ गई, लेकिन इसी जिले की बिगोद नगरपालिका में 91% से ज्यादा वोटिंग का रिकॉर्ड बना। झुंझुनूं में भी मतदान प्रतिशत 74.70% रहा, जो पिछले चुनाव से करीब 2.1 फीसदी कम है। यहां 2024 के उपचुनाव में पहली बार बीजेपी का विधायक जीता था, ऐसे में कम मतदान को जनता के सुस्त रुख से जोड़कर देखा जा रहा है। धौलपुर में स्थिति पिछले चुनाव जैसी ही रही, जहां इस बार 74.63% वोटिंग दर्ज की गई।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

राजनीतिक विश्लेषक महेश शर्मा के मुताबिक, केवल मतदान प्रतिशत के आधार पर चुनावी नतीजों का सटीक अनुमान लगाना मुश्किल होता है। शहरी निकाय चुनावों में स्थानीय मुद्दे सबसे अहम भूमिका निभाते हैं। वोटिंग घटने या बढ़ने को अमूमन मतदाताओं के उत्साह का पैमाना माना जाता है, हालांकि कई बार बढ़ा हुआ मतदान जनता के आक्रोश या बदलाव की इच्छा को भी दर्शाता है। इसके अलावा, प्रत्याशियों को लेकर स्थानीय स्तर पर उदासीनता भी कम मतदान की बड़ी वजह बनती है। चुनाव संपन्न होने के साथ ही दोनों प्रमुख दलों ने अपने-अपने प्रत्याशियों की बाड़ेबंदी शुरू कर दी है और उम्मीदवारों को फोन कर पार्टी कार्यालय बुलाया गया है।