भारतीय निवेशकों के बीच सोने का क्रेज पिछले एक साल में नई ऊंचाइयों पर पहुंच गया था। शानदार रिटर्न मिलने के बाद निवेशकों ने गोल्ड ईटीएफ (Gold ETFs) में रिकॉर्ड पैसा झोंक दिया। लेकिन इसके तुरंत बाद बाजार में करेक्शन आया और कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्पॉट गोल्ड इस समय 4,400 डॉलर प्रति औंस के आसपास कारोबार कर रहा है। हालांकि यह आंकड़ा एक साल पहले की तुलना में अब भी 21 फीसदी ज्यादा है, लेकिन जनवरी के अंत में बने 5,595 डॉलर के रिकॉर्ड हाई से यह करीब 21 फीसदी नीचे आ चुका है। भारतीय बाजार में इस गिरावट का असर उन निवेशकों पर ज्यादा पड़ा जिन्होंने तेजी देखकर बाजार में एंट्री की थी।

मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर 2 मार्च को सोना 1,69,349 रुपये प्रति 10 ग्राम के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था। जुलाई की शुरुआत तक यह गिरकर करीब 1,34,500 रुपये पर आ गया था, जो अब सुधरकर लगभग 1.52 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुंच चुका है। यह रिकवरी भले ही कुछ राहत दे रही हो, लेकिन पीक के करीब खरीदारी करने वालों के लिए यह एक बड़ा सबक है।

गोल्ड ईटीएफ में रिकॉर्ड निवेश और टाइमिंग की गलती

भारत में सोने के प्रति दीवानगी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वित्त वर्ष 2026 में गोल्ड ईटीएफ में 68,868 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश आया। यह आंकड़ा पिछले पांच वित्तीय वर्षों में इस कैटेगरी में आए कुल निवेश के दोगुने से भी ज्यादा था।

अकेले जनवरी महीने में गोल्ड ईटीएफ में 24,040 करोड़ रुपये का निवेश आया, जो उस महीने इक्विटी म्यूचुअल फंड्स में आए निवेश के लगभग बराबर था। इस भारी पूंजी के आने से गोल्ड ईटीएफ में एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) 191 फीसदी उछलकर 1.71 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया।

समस्या यह है कि इस निवेश का एक बड़ा हिस्सा तब आया जब सोना पहले ही एक लंबी और तेज रैली दिखा चुका था। एगनैम एडवाइजर्स के फाउंडर और सीईओ प्रशांत मिश्रा के मुताबिक, सोना हमेशा से लंबी अवधि में बेहतरीन रिटर्न देने वाला एसेट रहा है, लेकिन जिन लोगों ने शिखर के पास खरीदारी की, वे आज भी घाटे में हैं। सोने की समस्या कभी खुद एसेट नहीं रही, बल्कि निवेशकों द्वारा गलत समय पर एंट्री करना रही है।

पोर्टफोलियो में सोने की सही हिस्सेदारी

पारंपरिक रूप से पोर्टफोलियो में सोने की भूमिका सबसे बड़ा रिटर्न जनरेटर बनने की नहीं होती। इसका उपयोग मुख्य रूप से एक डाइवर्सिफायर और महंगाई, मुद्रा में कमजोरी तथा आर्थिक अनिश्चितताओं के खिलाफ हेज के रूप में किया जाता है।

लेकिन जब कीमतें लगातार बढ़ती हैं, तो निवेशक इसे एक बैलेंस्ड निवेश की बजाय मोमेंटम ट्रेड के रूप में देखने लगते हैं। इससे पोर्टफोलियो में सोने का एलोकेशन वित्तीय योजना की जरूरत से कहीं ज्यादा हो जाता है, जिससे जोखिम बढ़ जाता है।

छोटे एलोकेशन वाले निवेशकों के लिए एसआईपी (SIP) आधारित एप्रोच अब भी सही साबित हो सकती है, लेकिन जिन लोगों ने इस रैली के दौरान अपना exposure बहुत ज्यादा बढ़ा लिया था, उन्हें अब यह सोचना होगा कि उनके पोर्टफोलियो में सोने की मात्रा कितनी होनी चाहिए।

सोने के आगे के रुख को तय करने वाले कारक

सोने की अगली चाल कई वैश्विक कारकों पर निर्भर करेगी, जिसमें ब्याज दरें, आर्थिक वृद्धि, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी और मुद्रा में उतार-चढ़ाव शामिल हैं। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के बेस केस के मुताबिक, साल की दूसरी छमाही में सोना 4,100 डॉलर प्रति औंस के दायरे में कारोबार कर सकता है। हालांकि, वैश्विक विकास दर में और गिरावट आने पर कीमतें 4,500 डॉलर के पार भी जा सकती हैं।

ब्याज दरों की भूमिका इसमें सबसे अहम है क्योंकि सोना कोई ब्याज आय नहीं देता। ऐसे में उच्च वास्तविक ब्याज दरों के कारण सोना, ब्याज देने वाले अन्य एसेट के मुकाबले कम आकर्षक हो जाता है। दूसरी ओर, केंद्रीय बैंकों की ओर से लगातार जारी खरीदारी (लगभग 1,000 टन सालाना) सोने के लिए मजबूत सपोर्ट बनी हुई है।

भारतीय निवेशकों के लिए रुपया भी एक बड़ा फैक्टर रहा है। पिछले एक साल में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय मुद्रा में करीब 10 फीसदी की कमजोरी आई है, जिसने अंतरराष्ट्रीय कीमतों में करेक्शन के बावजूद घरेलू बाजार में सोने को सपोर्ट दिया है।

गोल्ड लोन सेगमेंट में रेगुलेटरी और सिस्टम की चुनौतियां

सोना भारतीय परिवारों के लिए केवल निवेश का साधन नहीं है, बल्कि कर्ज लेने के लिए इसका इस्तेमाल कॉलेटरल के रूप में भी तेजी से बढ़ा है। गोल्ड लोन बाजार के तेजी से विस्तार ने लेंडर द्वारा अपनाए जाने वाले वैल्यूएशन, होल्डिंग और ऑक्शन सिस्टम की कमजोरियों को सामने ला दिया है।

मोबिक्यू टेक्नोलॉजीज के को-फाउंडर और चीफ ऑफ प्रोडक्ट्स यतिन पेडनेकर के मुताबिक, गोल्ड लोन पोर्टफोलियो में 3.8 गुना बढ़ोतरी ने लेंडर्स के यहां मौजूद फ्गमेंटेड सिस्टम की सीमाओं को उजागर किया है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नए दिशा-निर्देशों के बाद कंप्लायंस केवल एक टॉप-लेवल गाइडलाइन नहीं रह गया है। बैंकों को अब स्पॉट प्राइस वोलैटिलिटी के आधार पर डायनेमिक LTV कैप, सख्त कोलैटरल रिलीज क्लॉक और डिफॉल्ट ऑक्शन प्रक्रिया की पूरी ऑडिटेबिलिटी सुनिश्चित करनी होगी।

फिंडबॉक्स के सीईओ और को-फाउंडर रजत देशपांडे के अनुसार, लेंडर्स को अब केवल ब्रॉड ब्रांच-लेवल प्रक्रियाओं पर भरोसा करने के बजाय व्यक्तिगत लोन स्तर पर कंप्लायंस साबित करना होगा। रेगुलेटर अब यह नहीं देख रहा है कि आपने औसत रूप से नियम का पालन किया या नहीं, बल्कि वह लोन-दर-लोन प्रमाण मांग रहा है।