ताले और चाबी का संबंध सहचर्य है। एक दूसरे का पूरक है। एक दूसरे के बिना अधूरा है। ताला, चाबी के बिना रह नहीं सकता। ताले और चाबी का एक साथ रहना, एक दूसरे के जरूरी भी है और मजबूरी भी। अगर ताले की चाबी गुम हो जाती है तो, या तो उसकी नई चाबी यानी उसकी पूरक चाबी बनवानी पड़ती है, या फिर उस ताले को तोड़ कर नया ताला लगवाना पड़ता है।

-लौकिक संसार में आत्मीय संबंधों के संदर्भ में, ताले चाबी का यह सहचर्य संबंध कई मायनों में अजूबा और अनूठा है। इसमें ताला नहीं, चाबी को बदलना पड़ता है, या फिर नया ताला लगवाना पड़ता है। जीवन के हर क्षेत्र में ताले चाबी का यह सहचर्य संबंध, विभिन्न रूप और स्वरूप में, प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से हमारे सामने हर समय मौजूद रहता है, महसूस होता रहता है।

साहित्य की हर विधा में ताला और चाबी, रचनाकारों की लेखनी को खोलती और बंद करती रही है। यह आजादी और बंधन का प्रतीक है, सवाल भी है और जवाब भी। यह दो परस्पर विरोधी ताकतों के बीच के सहचर्य संबंध को भी दर्शाता है। इसमें बंधन और मुक्ति है तो आपसी सहयोग और समन्वय भी।

जीवन के विभिन्न पहलुओं को खोलने, बंद करने, या फिर उसे सुरक्षित रखने के लिए प्रतीकात्मक रूप से भी ताले और चाबी के शब्दों का उपयोग किया जाता है, चाहे वह लोकोक्ति के रूप में हो, या फिर मुहावरे के रूप में। भावनाओं के भवन में मजबूत संबंधों को बांधने, खोलने और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए, कभी कभी कह भी दिया जाता है कि अबे ओछी काट, गुस्से ने ताळे में बंद कर ने चाबी तळाब में फेंक दे, ओइज थारे वास्ते ठीक रेवेला।

यानी जीवन के हर पहलू में, ताला और चाबी संभावनाओं के द्वार खोलता है तो बंद भी कर देता है । पारिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मसले हो या फिर धार्मिक, अध्यात्मिक, नैतिक या मनोवैज्ञानिक, हर स्तर पर ताले और चाबी के जरिए, ज्ञान से विज्ञान तक के रास्ते को सरलता और सहजता से पार किया जा सकता है। इसका सबसे बड़ा कारण संस्कारों की चाबी है, जो हर घर परिवार में किसी न किसी रूप में मौजूद रहती है।

-हर किसी के पास हर ताले की एक चाबी जरूर होती है, जो हर समय ताले के साथ होती है, ताकि वक्त जरूरत वह काम आती है। खास बात यह कि सही ताले की चाबी सही हो। चाबी संभालना भी सजगता का काम है। अनाड़ी के हाथों में चाबी जी का जंजाल बन जाती है। इसीलिए बुजुर्ग अपने घर परिवार की जिम्मेदारियों को योग्य और अनुभवी सदस्यों को सौंपते हैं।

-सास भी अपने घर की चाबियां सोच संभाल कर, उचित समय पर अपनी बहू को संभलाती है। यह केवल चाबियों का गुच्छा नहीं, घर परिवार की मर्यादा, विरासत और संस्कारों का गुच्छा होता है, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी सहेजना और संवारना होता है। इस गुच्छे में हर उस ताले की चाबी होती है, जो घर परिवार की रक्षा और सुरक्षा के लिए कुंडी पर लटका रहता है। वहां उसी ताले को लटकाया जाता है, जो मजबूत और भरोसेमंद हो, और जो सुरक्षा की गारंटी हो। घर का मालिक भी जब बाहर जाता है, तो दो तीन बार उसे खंगालता है कि कहीं वह ठीक से बंद तो नहीं हुआ। पूरी जांच परख के बाद ही वह घर की देहरी को पार करता है, इस उम्मीद से कि उसके रहते घर सुरक्षित रहेगा।

जीवन के हर क्षेत्र में सही ताले की सही चाबी का होना जरूरी है। बचपन, यौवन, बुढ़ापा हो या फिर ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ या संन्यास, सही ताले की सही चाबी मेलमिलाप का आधार बनती है। प्रेम, प्यार के संबंधों में ताला चाबी, बंधन और प्रबंधन के रूप में भी सामने आती है। बॉबी फिल्म का गीत, हम तुम एक कमरे में बंद हो और चाबी खो जाए, में चाबी अगर नहीं मिली तो क्या होगा। बंधन में जाना है तो प्रबंधन भी साथ लेकर जाना होगा, वरना अंजाम सबके सामने तो होगा ही। किसी खिड़की या दरवाजे पर लटका ताला, देश काल और परिस्थितियों से जंग खाते हुए अकेला एक जगह पर, अपनी तन्हाई पर आंसू बहाता है। अपनी चाबी के आने की बाट जोहता है। इस उम्मीद में कि कभी न कभी तो, एक बार फिर वह वापस लौटकर आएगा, और मुझे प्यार से उन्हीं हाथों से आकर खोलेगा।

-मैं थोड़ा सा रुठूंगा तो जंग भरे बदसूरत चेहरे पर, वो प्यार और स्नेह से तेल की कुछ बूंदें टपका कर मेरे गुस्से को शांत कर मेरे को बंधन से आजाद करेगा। कभी तो मेरी यह ख्वाहिश पूरी होगी, वरना हथौड़े की एक चोट का इंतजार तो मुझे हमेशा रहेगा। मैं जानता हूं कि जब तक उसके हाथ में इस ताले की चाबी है, तब तक यह घर परिवार हर तरह से रक्षित और सुरक्षित है। क्यूंकि सही ताले की चाबी सही हाथों में हैं और उसे ताला लगाना और खोलना आता हैं।

 

यादों के घरोंदे पर वह ताला जड़ गया

जल्दी में था शायद साथ में, चाबी भी ले गया

कैसे उसको खोलूं, आता नहीं मुझे

मिल जाएगी कभी तो, पूछूंगा जरुर उसे