हिन्दू और जैन धर्म में विशेष धार्मिक महत्व रखने वाला चातुर्मास इस साल 21 नवंबर 2026 को समाप्त हो रहा है। देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के योगनिद्रा से जागने के साथ ही चार महीने से थमे मांगलिक कार्यों का सिलसिला एक बार फिर शुरू हो जाएगा। इसके साथ ही विवाह, गृह प्रवेश और मुंडन जैसे संस्कारों के लिए शुभ मुहूर्तों की शुरुआत होगी।
पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में चातुर्मास की शुरुआत 25 जुलाई को हुई थी। इस चार महीने की अवधि में पूजा-पाठ, साधना, व्रत और संयम को विशेष प्राथमिकता दी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक भगवान विष्णु के योगनिद्रा में रहने के कारण इस दौरान विवाह जैसे मांगलिक आयोजनों से परहेज किया जाता है। चातुर्मास का समापन होते ही अब वैवाहिक कार्यक्रमों की तैयारियां जोर पकड़ लेंगी।
नवंबर 2026 में विवाह की शुभ तिथियां
चातुर्मास समाप्त होने के ठीक बाद नवंबर के आखिरी सप्ताह में विवाह के लिए कई शुभ मुहूर्त उपलब्ध हैं। पंचांग के अनुसार मुख्य तिथियां इस प्रकार रहेंगी:
- 21 नवंबर 2026 (शनिवार): सुबह 06:44 बजे से 22 नवंबर की सुबह 12:08 बजे तक, रेवती नक्षत्र।
- 24 नवंबर 2026 (मंगलवार): रात 11:25 बजे से 25 नवंबर की सुबह 06:47 बजे तक, रोहिणी नक्षत्र।
- 25 नवंबर 2026 (बुधवार): सुबह 06:47 बजे से 26 नवंबर की सुबह 06:48 बजे तक।
- 26 नवंबर 2026 (गुरुवार): सुबह 06:48 बजे से शाम 05:47 बजे तक।
दिसंबर 2026 में शादी के प्रमुख मुहूर्त
दिसंबर के महीने में भी शादियों के लिए कई अच्छे योग बन रहे हैं। महीने के शुरुआती और मध्य हिस्से में विवाह की प्रमुख तिथियां मिलेंगी:
- 2 दिसंबर 2026 (बुधवार): नवमी और दशमी तिथि।
- 3 दिसंबर 2026 (गुरुवार): उत्तर फाल्गुनी और हस्त नक्षत्र।
- 4 दिसंबर 2026 (शुक्रवार): एकादशी तिथि।
- 5 दिसंबर 2026 (शनिवार): द्वादशी और त्रयोदशी तिथि।
- 6 दिसंबर 2026 (रविवार): त्रयोदशी तिथि।
- 11 दिसंबर 2026 (शुक्रवार): तृतीया तिथि।
- 12 दिसंबर 2026 (शनिवार): तृतीया और चतुर्थी तिथि।
चातुर्मास के दौरान क्या करें और क्या न करें
धार्मिक नियमों के अनुसार चातुर्मास की अवधि में सात्त्विक जीवनशैली अपनाने पर जोर दिया जाता है। इस दौरान प्रतिदिन ध्यान, योग, जप और आत्मसंयम का अभ्यास किया जाता है। साथ ही जरूरतमंदों को अन्न और वस्त्र का दान देना पुण्यकारी माना गया है।
इसके विपरीत, इस काल में विवाह, मुंडन, उपनयन संस्कार और गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं। इसके अलावा मास के अनुसार खानपान से जुड़े कुछ विशेष परहेज भी किए जाते हैं, जैसे श्रावण मास में पत्तेदार सब्जियां, भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध और कार्तिक महीने में प्याज, लहसुन व उड़द की दाल का त्याग करने की परंपरा है। क्रोध, ईर्ष्या और कटु वचनों से दूर रहकर अनुशासन का पालन करना इस अवधि का मुख्य उद्देश्य होता है।
