डिंडौरी जिले के बजाग विकासखंड स्थित चाड़ा के सीनियर बालक छात्रावास में व्यवस्थाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। परिसर में फैली गंदगी, दूषित पेयजल और बुनियादी सुविधाओं के अभाव के बीच छात्र बदहाल माहौल में रहने को मजबूर हैं। स्थानीय स्तर पर सामने आए इन आरोपों के बाद सरकारी छात्रावासों के संचालन और प्रशासनिक मॉनिटरिंग पर सवालिया निशान लग गया है।
चाड़ा स्थित इस आदिवासी बालक छात्रावास में रहने वाले विद्यार्थियों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। परिसर के बाथरूम लंबे समय से बदहाल स्थिति में हैं, जबकि पूरे इलाके में कचरा और गंदगी पसरी हुई है। चौंकाने वाली बात यह है कि छात्रावास परिसर में बीड़ी के पैकेट और अन्य नशीली सामग्री भी मिलने की बात सामने आई है, जिससे छात्रों की सुरक्षा और देखरेख पर सीधे सवाल उठ रहे हैं।
पानी की टंकी में कीड़े और बच्चों की सेहत
छात्रावास में बच्चों के पीने और दैनिक उपयोग के लिए बनाए गए पानी के स्रोतों को लेकर स्थिति सबसे चिंताजनक है। आरोप है कि पानी की टंकी में गंदगी के साथ कीड़े पाए जा रहे हैं। इसी दूषित पानी के इस्तेमाल के कारण यहां रहने वाले बच्चे बार-बार बीमार पड़ रहे हैं।
इसके अलावा, छात्रों को ठंड या सामान्य दिनों में भी पर्याप्त बिस्तर और बेडशीट मुहैया नहीं कराई जा रही है। हालात यह हैं कि कई छात्र मजबूरी में चादर की जगह कंबलों का ही इस्तेमाल करने को विवश हैं। भोजन की गुणवत्ता और निर्धारित मेन्यू के पालन को लेकर भी छात्रों और स्थानीय लोगों ने आवाज उठाई है।
आदिवासी बहुल क्षेत्र में व्यवस्थाओं पर प्रशासनिक सुस्ती
डिंडौरी एक आदिवासी और बैगा बहुल जिला है, जहां दूर-दराज के गांवों से आकर बच्चे इन छात्रावासों में रहकर पढ़ाई करते हैं। शासन स्तर से इन संस्थाओं के संचालन के लिए बजट और संसाधन मुहैया कराए जाते हैं, लेकिन मैदानी स्तर पर उनका क्रियान्वयन कितना प्रभावी है, चाड़ा का यह मामला इसकी पोल खोलता है।
छात्रावास अधीक्षक शिवप्रसाद पनिका और संबंधित जनजातीय कार्य विभाग के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी उंगलियां उठने लगी हैं। स्थानीय स्तर पर लगातार मिल रही शिकायतों के बावजूद अब तक जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा ठोस निरीक्षण या सुधारात्मक कदम न उठाया जाना प्रशासनिक उदासीनता को दर्शाता है।
