दिपावली के पावन पर्व पर महालक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा का विधान है। सनातन परंपरा में कई ऐसी तस्वीरें और प्रतीक हैं, जो धर्म के साथ-साथ जीवन प्रबंधन के गहरे पाठ पढ़ाते हैं। ऐसी ही एक लोकप्रिय तस्वीर है, जिसमें देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु के चरणों के पास बैठी नजर आती हैं।यह मुद्रा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि व्यक्ति के कर्म, धन के प्रति दृष्टिकोण और जीवन दर्शन से जुड़े कई बड़े संदेश देती है।
कर्म और पुरुषार्थ का प्रतीक हैं श्रीहरि
भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनकर्ता और रक्षक माना गया है। वे आलस्य छोड़कर निरंतर कर्म करने यानी पुरुषार्थ के प्रतीक हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, श्रीहरि ने अलग-अलग समय पर कई अवतार लेकर यह संदेश दिया है कि धर्म के मार्ग पर चलना ही जीवन का सच्चा पुरुषार्थ है। जो व्यक्ति निष्ठा के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करता है, वही वास्तविक जीवन प्रबंधन को समझता है।
धन और कर्म का सीधा संबंध
तस्वीर में देवी लक्ष्मी का विष्णु जी के चरणों के पास बैठना यह बताता है कि धन की प्राप्ति का मार्ग कर्म और धर्म से होकर जाता है।
- निःस्वार्थ कर्म: जो मनुष्य भगवान विष्णु की तरह बिना फल की लालसा के ईमानदारी से कार्य करता है, महालक्ष्मी स्वयं उसके पास चलकर आती हैं।
- धन का सेवक न बनना: श्रीहरि को निर्मोही माना गया है, जिन्हें सांसारिक प्रलोभन नहीं होते। इसी तरह मनुष्य को भी धन का गुलाम बनने के बजाय उसे अपने जीवन का एक साधन मात्र समझना चाहिए।
धन के अहंकार से दूरी क्यों जरूरी है?
तस्वीर का सबसे बड़ा संदेश यह है कि धन यानी लक्ष्मी हमेशा पुरुषार्थी के चरणों के पास होती हैं, सिर पर नहीं। इसका साफ अर्थ है कि इंसान को कभी भी धन का अहंकार नहीं करना चाहिए। जब कोई व्यक्ति धन को ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य मान लेता है, तो उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है और अहंकार उसका पतन तय कर देता है।
दिमाग में धन के बजाय सत्कर्म, विनम्रता और धर्म को स्थान देना चाहिए। जब धन को विनम्रता से स्वीकार किया जाता है और उसका उपयोग जनसेवा या सत्कर्मों में होता है, तभी वह व्यक्ति के पास लंबे समय तक टिकता है। केवल भाग्य के भरोसे हाथ पर हाथ रखकर बैठने वालों के पास कभी भी स्थायी समृद्धि नहीं ठहरती, क्योंकि लक्ष्मी वहीं वास करती हैं जहां श्रम और धर्म साथ-साथ चलते हैं।
