राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को नागपुर में बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि देश के भीतर कुछ ताकतें भारत को दबाने और कमजोर करने के लिए बांग्लादेश और फ्रांस जैसे हालात पैदा करने की कोशिश कर रही हैं। इन ताकतों का मकसद केवल सत्ता परिवर्तन कर व्यवस्था सुधारना नहीं, बल्कि अपने पिट्ठू नेताओं को सत्ता में बिठाना है।
नागपुर स्थित संघ मुख्यालय में आयोजित विजयादशमी उत्सव को संबोधित करते हुए भागवत ने यह बात कही। कार्यक्रम में उन्होंने पारंपरिक शस्त्र पूजन भी किया। संघ की स्थापना 1925 में इसी दिन हुई थी और तब से हर साल विजयादशमी पर यह उत्सव मनाया जाता है।
देश तोड़ने की साजिश और नेताओं का समर्थन
संघ प्रमुख ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि देश और हिंदू समाज को खंडित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। चिंता की बात यह है कि ऐसी ताकतों को कुछ तथाकथित नेताओं का भी अप्रत्यक्ष समर्थन मिल रहा है। उन्होंने आगाह किया कि बाहरी और अंदरूनी शक्तियां मिलकर देश के सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करना चाहती हैं।
"दुनिया में ऐसी ताकतें हैं, जो भारत को आगे बढ़ता नहीं देखना चाहतीं। उनके प्रभाव में आकर हमें उत्तेजित होने की जरूरत नहीं है, बल्कि सतर्क रहने की आवश्यकता है।" — मोहन भागवत, RSS प्रमुख
इस कार्यक्रम में इजराइल के काउंसल जनरल यानिव रेवाच भी विशेष रूप से मौजूद रहे। उनके अलावा मंच पर पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और उनकी पत्नी डॉ. सुदेश धनखड़, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भी शिरकत की।
इतिहास से सबक और एकता की जरूरत
भारत के विभाजन और ऐतिहासिक घटनाओं का जिक्र करते हुए भागवत ने कहा कि लॉर्ड कर्जन ने हिंदू-मुस्लिम आधार पर बंगाल का विभाजन किया था, जिसे जनता के विरोध के चलते चार साल बाद वापस लेना पड़ा था। हालांकि, 1947 में देश का बंटवारा नहीं टल सका क्योंकि समाज के एक वर्ग के मन में यह बात बैठ गई थी कि जो अलग दिखते हैं, वे अलग ही हैं। उन्होंने जोर दिया कि हमारे पूर्वज और सांस्कृतिक मूल एक हैं, इसलिए किसी की पहचान मिटाए बिना सबको साथ लेकर चलना ही देश की असली ताकत है।
आंदोलनों के स्वरूप और विकास के मायने
आंदोलनों की प्रकृति पर बात करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि हर समस्या पर आवाज उठाना स्वाभाविक है, लेकिन उसका उद्देश्य समाज में द्वेष फैलाना नहीं, बल्कि समाधान तलाशना होना चाहिए। कई बार आंदोलनों का राजनीतिकरण कर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि देश सिर्फ नेताओं के भरोसे नहीं चलता, बल्कि नागरिकों की सक्रिय भागीदारी से ही असली बदलाव आता है।
पर्यावरण और तकनीक के संतुलन पर उन्होंने नेपाल बाढ़ का उदाहरण दिया। भागवत ने कहा कि तकनीक और बुनियादी ढांचे का विकास जरूरी है, लेकिन यह प्रकृति की कीमत पर नहीं होना चाहिए। विकास ऐसा हो जिसमें अर्थशास्त्र के साथ पर्यावरण (इकोलॉजी) और नैतिक मूल्यों (एथिक्स) का भी पूरा ध्यान रखा जाए।
OTT और AI पर नियंत्रण की वकालत
आधुनिक तकनीक और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के दौर पर चिंता जताते हुए भागवत ने कहा कि आज सूचनाओं की बाढ़ है, लेकिन बिना सोचे-समझे उनका इस्तेमाल घातक साबित हो सकता है। उन्होंने मांग की कि ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स के लिए सख्त नियम तय किए जाने चाहिए और इस पर सरकार तथा प्रशासन को गंभीरता से विचार करना होगा। इसके साथ ही, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के सुरक्षित और सकारात्मक उपयोग की वकालत भी उन्होंने की।
