सावन महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाए जाने वाले नाग पंचमी पर्व का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। इस दिन नाग देवता की पूजा कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। हालांकि, उत्तर भारत के कई हिस्सों में इस दिन से जुड़ी एक ऐसी परंपरा भी निभाई जाती है, जिसे देखकर लोग हैरान रह जाते हैं। इसे 'गुड़िया पीटना' कहा जाता है।
क्या है गुड़िया पीटने की परंपरा?
लोक मान्यताओं के अनुसार, नाग पंचमी के दिन बहनें कपड़े से गुड़िया बनाकर जमीन पर रखती हैं और भाई प्रतीकात्मक रूप से उसे डंडे से पीटते हैं। इसे किसी व्यक्ति या स्त्री के अपमान के तौर पर नहीं देखा जाता, बल्कि यह प्राचीन लोक कथाओं और प्रतीकों से जुड़ी एक पुरानी परंपरा है। उत्तर भारत के कुछ ग्रामीण इलाकों में आज भी यह रस्म उसी रूप में निभाई जाती है, जैसी सदियों पहले से चली आ रही है।
परंपरा से जुड़ी पौराणिक कथा
इस अनूठी रस्म के पीछे दो अलग-अलग कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के मुताबिक, एक किसान खेत में हल चला रहा था, तभी अनजाने में उसके हल से नागिन के कुछ बच्चे कुचलकर मर गए। इस घटना से क्रोधित नागिन ने किसान और उसके पूरे परिवार को डस लिया।
हालांकि, किसान की बेटी की शादी हो चुकी थी और वह अपने ससुराल में रहती थी। जब नागिन उसे डसने पहुंची, तो उसने श्रद्धा के साथ नाग देवता की पूजा की हुई थी। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर नागिन ने न केवल उसे क्षमा कर दिया, बल्कि उसके पूरे परिवार को जीवनदान भी दे दिया।
भाई-बहन के प्रेम और प्रायश्चित की कहानी
दूसरी लोक कथा एक शिव भक्त लड़के और उसकी बहन से जुड़ी है। मंदिर के पास रहने वाला एक सांप उस लड़के की नियमित शिव भक्ति से बेहद स्नेह रखता था और अक्सर उसके पैरों से लिपट जाता था। एक दिन जब लड़का अपनी बहन को मंदिर लेकर गया, तो सांप हमेशा की तरह उसके पैर से लिपट गया।
बहन ने जब भाई के पैर से सांप लिपटा देखा, तो उसे लगा कि वह भाई को डंसने जा रहा है। अपनी समझ के अनुसार भाई की जान बचाने के लिए उसने पास रखा डंडा उठाया और सांप को पीट-पीटकर मार डाला।
जब भाई ने उसे बताया कि वह नाग नुकसान नहीं पहुंचा रहा था, बल्कि स्नेहवश आया था, तो बहन को नाग हत्या का भयंकर पछतावा हुआ। इसी अनजाने में हुए पाप के प्रायश्चित के रूप में वास्तविक रूप से किसी को सजा न देकर, प्रतीक के तौर पर कपड़े की गुड़िया को पीटने की परंपरा की शुरुआत हुई।
