पितृ पक्ष का समय पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने और उनका आशीर्वाद पाने का काल माना जाता है। इन दिनों तर्पण और पिंडदान के साथ-साथ रसोई में बनने वाले भोजन को लेकर भी कई तरह के नियम और मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। एक तरफ जहां धार्मिक ग्रंथ खान-पान को लेकर सख्त और सात्विक निर्देश देते हैं, वहीं दूसरी ओर कई परिवारों में पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक परंपरा यानी कुलाचार के अपने अलग नियम होते हैं।
पितृ पक्ष के भोजन का धार्मिक महत्व
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष के दौरान पूर्वज धरती पर आकर अपने वंशजों के बीच निवास करते हैं और उनसे तर्पण व पिंडदान की अपेक्षा रखते हैं। इस दौरान परिवार का आचरण, विचार और भोजन तीनों को शुद्ध और सात्विक रखने पर जोर दिया जाता है, ताकि पितरों को शांति मिल सके। यही वजह है कि इस अवधि में खान-पान के नियमों का विशेष पालन किया जाता है।
शास्त्रों में तय किए गए खान-पान के नियम
शास्त्रों के अनुसार, पितृ पक्ष में पूरी तरह सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए। सात्विक आहार का अर्थ ऐसा भोजन है जो मन और शरीर दोनों को शांत रखे, जिसमें दाल, चावल, हरी सब्जियां, फल और शुद्ध घी से बने पकवान शामिल हैं। मांस, मदिरा और लहसुन-प्याज जैसे तामसिक पदार्थों का सेवन इस दौरान वर्जित माना गया है, क्योंकि ऐसी चीजें मन में विकार उत्पन्न करती हैं जो श्राद्ध कर्म की पवित्रता के खिलाफ हैं।
श्राद्ध और पिंडदान के लिए बनने वाले भोजन में चावल, जौ, तिल, दूध, घी और शहद को विशेष रूप से शामिल किया जाता है, जिन्हें पितरों के लिए प्रिय और पवित्र माना गया है। भोजन तैयार करते समय रसोई की स्वच्छता का पूरा ध्यान रखा जाता है। खाना बनाने वाले व्यक्ति को भी स्नान कर शुद्ध अवस्था में रहना अनिवार्य बताया गया है। इसके अलावा श्राद्ध कर्म के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराने और गाय, कौवे, कुत्ते, चींटी व देवताओं के लिए भोजन का अंश (पंचबलि) निकालने की परंपरा है।
कुलाचार और पारिवारिक परंपराओं की भूमिका
शास्त्रों के सामान्य नियमों के अलावा देश के अलग-अलग क्षेत्रों, जातियों और परिवारों में अपना कुलाचार यानी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही परंपराएं भी होती हैं, जो कई बार शास्त्रीय विधान से अलग हो सकती हैं। कुछ परिवारों में इस दौरान पूरी तरह प्याज-लहसुन रहित भोजन बनता है, तो कुछ समुदायों में विशेष रूप से पारंपरिक मांसाहारी व्यंजन भी पितरों को अर्पित किए जाते हैं।
बंगाल, असम और कुछ दक्षिण भारतीय परिवारों में कुलदेवता और पितरों की रुचि के अनुसार विशेष व्यंजन बनाने की प्रथा है। कुलाचार में इस मान्यता को भी अहम माना जाता है कि श्राद्ध में वही भोजन तैयार किया जाए जो दिवंगत पितर को जीवित रहते सबसे अधिक पसंद था। कई परिवार अपने पारिवारिक पुरोहित से परामर्श लेकर ही विधि तय करते हैं, क्योंकि उन्हें कुल की परंपराओं की पुरानी जानकारी होती है।
भोजन से जुड़ी जरूरी सावधानियां
श्राद्ध के दिन भोजन ग्रहण करने से पहले पितरों के निमित्त अंश अवश्य निकाला जाता है। इस दौरान कुछ बातों का विशेष ध्यान रखा जाता है:
- श्राद्ध वाले दिन घर में ताजा भोजन ही बनाएं और बासी खाने के प्रयोग से बचें।
- कई परिवारों में इस दिन केवल एक बार ही भोजन पकाने की परंपरा है।
- ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराए बिना स्वयं भोजन ग्रहण नहीं किया जाता है।
- खाना बनाते समय नए या अशुद्ध बर्तनों के इस्तेमाल से परहेज किया जाता है।
