श्राद्ध पक्ष की शुरुआत के साथ ही तीर्थनगरी ओंकारेश्वर के नर्मदा घाटों पर पितृ कर्म और तर्पण का दौर शुरू हो गया है। सुबह से ही श्रद्धालु पवित्र नर्मदा में डुबकी लगाने के बाद अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और तर्पण कर रहे हैं। उत्तर तट पर स्थित ऐतिहासिक गया शिला इस दौरान श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बनी हुई है।
पांडव काल से जुड़ी है गया शिला की मान्यता
तीर्थनगरी के पुरोहितों के मुताबिक, गया शिला की स्थापना का इतिहास पांडव काल से जुड़ा है। किंवदंतियों के अनुसार, पांडवों के ओंकारेश्वर आगमन के वक्त उनके लिए गया जाना संभव नहीं हो पाया था। ऐसे में उन्होंने नर्मदा के उत्तरी तट पर गया शिला की स्थापना की और वहीं अपने पितरों का श्राद्ध और तर्पण संपन्न किया।
इस पौराणिक प्रसंग का जुड़ाव सोमवती अमावस्या से भी माना जाता है। इसी मान्यता के चलते आज भी श्रद्धालु गया शिला पर तर्पण करने को सीधे गया जाकर किए गए पिंडदान के समान ही पुण्यदायी मानते हैं।
विधि-विधान से हो रहा पितृ कर्म
नर्मदा तट पर अलसुबह से ही मंत्रोच्चार गूंजने लगे हैं, जिससे पूरा वातावरण धार्मिक और श्रद्धा से परिपूर्ण नजर आ रहा है। स्थानीय जानकारों के अनुसार, इस विशेष स्थान पर पितृपक्ष के दौरान तर्पण का खास महत्व है।
स्नान के पश्चात कुश, जौ, काले तिल, चावल, दूध, शहद और पुष्प जैसी पूजन सामग्रियों के जरिए विधि-विधान के साथ अनुष्ठान किए जा रहे हैं। पितृपक्ष के इन दिनों में दूर-दराज से आने वाले लोग अपने पूर्वजों को याद कर उनका आशीर्वाद ले रहे हैं।
