रिपोर्ट-गोपाल देवकर

लोकेशन-बुरहानपुर,मध्यप्रदेश

एक तरफ सरकार जल जीवन मिशन के तहत हर घर तक नल से पानी पहुंचाने के दावे कर रही है…बुरहानपुर जिले को पूरे देश में सबसे पहले हर घर नल से जल पहुंचाने वाले जिले का तमगा भी मिल चुका है…लेकिन दूसरी तरफ आदिवासी बाहुल्य धूलकोट क्षेत्र से जो तस्वीर सामने आई है, वो सरकारी दावों की हकीकत बयां कर रही है।यहां ग्राम पंचायत भगवानिया के रेखालिया झिरा फालिया में 45 आदिवासी परिवार एक ही गंदे कुएं के पानी पर निर्भर हैं।हालात इतने खराब हैं कि मासूम बच्चे अपनी जान जोखिम में डालकर करीब 25 फीट गहरे कुएं में उतरकर पानी निकालने को मजबूर हैं।रेखालिया झिरा फालिया में रहने वाले करीब 45 परिवारों के लिए ना नल है… ना टंकी… ना साफ पानी की व्यवस्था।पूरे फालिया के लोग इसी कुएं के गंदे पानी पर निर्भर हैं।कुएं में पानी इतना नीचे चला गया है कि बच्चे रस्सियों के सहारे अंदर उतरकर पानी भरते हैं।जरा सी चूक… और बड़ा हादसा हो सकता है,सरकार कहती है हर घर पानी पहुंचा… लेकिन यहां लोग कुएं में उतरकर पानी भर रहे हैं…”ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत को कई बार कुएं के गहरीकरण और पेयजल व्यवस्था की मांग की गई…लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला।अगर समय रहते कुएं का गहरीकरण हो जाता…तो आज मासूम बच्चों को अपनी जान जोखिम में डालकर पानी नहीं भरना पड़ता।गांव में बिजली की भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं है…और टैंकर भी नियमित रूप से नहीं पहुंच रहे।आदिवासी परिवारों का कहना है कि जल जीवन मिशन के बड़े-बड़े दावों के बावजूद उनके हिस्से में सिर्फ गंदा पानी और प्रशासनिक लापरवाही आई है।“हम लोग नीचे उतरकर पानी भरते हैं… डर लगता है लेकिन पानी तो लाना पड़ता है…”“कुएं का गहरीकरण और टैंकर की व्यवस्था होनी चाहिए…”मामले को लेकर कांग्रेस नेता अजय रघुवंशी ने जिला प्रशासन और पंचायत पर निशाना साधते हुए कहा कि आदिवासी क्षेत्रों की लगातार अनदेखी की जा रही है।उन्होंने कहा कि सरकार सिर्फ कागजों में योजनाएं चला रही है, जबकि जमीनी हालात बेहद खराब हैं।वहीं प्रशासन की ओर से सृजन श्रीवास्तव ने कहा कि मामले की जानकारी ली जा रही है और जल्द वैकल्पिक पेयजल व्यवस्था कराई जाएगी,वही SDM भागीरथ वाखला ने भी ग्रामीणों को राहत देने और आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन दिया है।फिलहाल सवाल यही है कि जब “हर घर नल से जल” का दावा किया जा चुका है…तो फिर आखिर आदिवासी बच्चे आज भी अपनी जान जोखिम में डालकर गंदा पानी भरने को क्यों मजबूर हैं?क्या जिम्मेदारों की नींद किसी बड़े हादसे के बाद खुलेगी…या फिर इन आदिवासी परिवारों को यूं ही प्यास और परेशानी के बीच जीना पड़ेगा…