छिंदवाड़ा जिले के सामरबोह गांव के एक छोटे किसान ने सीमित जमीन पर खेती को मुनाफे का सौदा बना दिया है। किसान रामचरण राउत ने पारंपरिक खेती की लीक से हटकर मल्टी क्रॉपिंग तकनीक अपनाई है, जिसके तहत वे एक ही खेत में अदरक के साथ-साथ खीरा, लौकी, करेला और गेंदा जैसी करीब नौ फसलें एक साथ ले रहे हैं। शुरुआती नुकसान के बाद शुरू हुआ यह प्रयोग अब क्षेत्र के दूसरे किसानों के लिए भी एक मिसाल बन गया है।
नुकसान के बाद बदला तरीका
रामचरण राउत की आजीविका पूरी तरह खेती पर निर्भर है, लेकिन उनके पास जमीन का दायरा सीमित है। उन्होंने कुछ साल पहले सिर्फ अदरक की फसल लगाई थी, लेकिन बाजार भाव और मौसम की अनिश्चितता के चलते उन्हें पहले साल ही आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। इस झटके के बाद उन्होंने अपनी रणनीति बदली और एक ही खेत में अलग-अलग समय पर तैयार होने वाली और एक-दूसरे की पूरक फसलें उगाने का फैसला किया।
शुरुआत में उन्होंने अदरक के साथ तीन तरह की बेल वाली सब्जियां लगाकर इस प्रयोग की शुरुआत की। पहले प्रयास में सफलता मिलने के बाद उनका हौसला बढ़ा और उन्होंने फसलों का दायरा लगातार बढ़ा दिया।
खेत में एक साथ लहरा रहीं ये फसलें
वर्तमान में रामचरण के एक एकड़ से भी कम के खेत में फसलों की लंबी फेहरिस्त तैयार होती है। अदरक के मुख्य उत्पादन के बीच में खीरा, लौकी, करेला, हरी मिर्च, टमाटर, बरबटी, बीन्स, गिलकी और बेबी कॉर्न की फसलें ली जा रही हैं। इसके अलावा खेत की मेड़ों और खाली जगह पर गेंदे के फूल भी उगाए जाते हैं, जो कीटों को दूर रखने के साथ-साथ अतिरिक्त आमदनी का जरिया बनते हैं।
विविधता अपनाने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि अगर किसी एक सब्जी का बाजार भाव गिर जाता है या मौसम की मार से फसल खराब होती है, तो दूसरी फसलों से होने वाली आय नुकसान की भरपाई कर देती है।
प्राकृतिक खेती और जैविक खाद पर जोर
रामचरण राउत अपनी इस खेती में रासायनिक खादों और कीटनाशकों का इस्तेमाल न के बराबर करते हैं। उनका दावा है कि उनकी खेती लगभग 90 प्रतिशत प्राकृतिक और जैविक है। वे बाजार से महंगे खाद-बीज खरीदने के बजाय अपने ही खेत में केंचुआ खाद (वर्मी कंपोस्ट) और गोबर की खाद तैयार करते हैं। इसके अलावा नीम और अन्य प्राकृतिक उत्पादों से बने कीटनाशकों का छिड़काव किया जाता है ताकि ग्राहकों तक पूरी तरह सुरक्षित और रसायनमुक्त सब्जियां पहुंच सकें।
परिवार के साथ मिलकर वे खेती के सारे काम खुद संभालते हैं। सब्जियों की तुड़ाई से लेकर उन्हें स्थानीय बाजार तक पहुंचाने की जिम्मेदारी रामचरण और उनकी पत्नी मिलकर उठाते हैं। हालांकि, कटाई (हारवेस्टिंग) के सीजन में मजदूरों की कमी जरूर खलती है, जिससे निपटने के लिए पूरा परिवार खेत में डटकर मेहनत करता है।
कृषि वैज्ञानिकों ने सराहा मॉडल
कृषि विभाग के विशेषज्ञों ने भी इस मॉडल को छोटे किसानों के लिए बेहद उपयोगी बताया है। वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. विजय कुमार पराड़कर के मुताबिक, मल्टी क्रॉपिंग तकनीक से सीमित जमीन वाले किसानों को सालभर आय का कोई न कोई स्रोत मिलता रहता है। हालांकि, इस पद्धति को अपनाने से पहले मिट्टी की उपजाऊ क्षमता, सही फसल संयोजन और स्थानीय बाजार की मांग का आकलन करना बेहद जरूरी होता है।
पारंपरिक खेती के संकट के बीच सामरबोह गांव के रामचरण राउत का यह मॉडल साबित करता है कि सही प्रबंधन, प्रयोग और प्राकृतिक तरीकों से कम जमीन में भी खेती को एक लाभ का व्यवसाय बनाया जा सकता है।
