देश में जल्द ही कागज के नोटों की जगह प्लास्टिक पॉलिमर से बने करेंसी नोट चलन में आ सकते हैं। केंद्र सरकार ने रिजर्व बैंक (RBI) के उस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है जिसके तहत 10 और 20 रुपए के एक-एक अरब प्लास्टिक नोटों के फील्ड ट्रायल की योजना है।

राज्यसभा में एक लिखित सवाल के जवाब में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इन नोटों का इस्तेमाल मौजूदा कागज आधारित नोटों के साथ ही किया जाएगा। हालांकि, प्रोक्योरमेंट यानी खरीद की प्रक्रिया अभी शुरुआती चरण में होने के कारण सरकार ने इसके लॉन्च की कोई निश्चित तारीख या समयसीमा तय नहीं की है।

पायलट फेज में है प्रोजेक्ट, जलवायु परिस्थितियों पर होगी नजर

इससे पहले पिछले सप्ताह हुई मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक के बाद आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस योजना की जानकारी दी थी। उन्होंने बताया था कि आरबीआई यह जांचेगा कि भारतीय जलवायु परिस्थितियों में ये प्लास्टिक नोट कैसे टिकते हैं और इसके लिए मौजूदा बैंकिंग बुनियादी ढांचा कितना तैयार है।

आरबीआई गवर्नर ने कहा था- "ट्रायल के नतीजों के आधार पर ही यह तय किया जाएगा कि इसे आगे कैसे और किस रूप में बढ़ाना है। अगर सब कुछ योजना के मुताबिक रहा, तो अगले वित्त वर्ष की शुरुआत तक इन नोटों को सर्कुलेशन में लाने का लक्ष्य है।" हालांकि, अधिकारियों का कहना है कि इस पूरी प्रक्रिया में अभी वक्त लग सकता है।

क्यों खास हैं प्लास्टिक पॉलिमर नोट?

पारंपरिक सूती कागज (कॉटन पेपर) के मुकाबले प्लास्टिक पॉलिमर नोट एक पतली और लचीली सिंथेटिक सामग्री से बनाए जाते हैं। ये कागज की तरह ही मोड़े जा सकते हैं, लेकिन इनकी उम्र पारंपरिक नोटों से दो से चार गुना ज्यादा होती है।

इन नोटों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि ये पानी और गंदगी से सुरक्षित रहते हैं। इसके अलावा, इनमें पारदर्शिता वाली आधुनिक सुरक्षा खिड़कियां (सिक्योरिटी विंडोज) भी शामिल होती हैं, जिससे नकली नोटों की पहचान आसान हो जाती है। दुनिया के कई देश पहले ही इस तकनीक को अपना चुके हैं।

दुनिया के किन देशों में होता है इस्तेमाल?

प्लास्टिक के नोटों का इतिहास तीन दशक से ज्यादा पुराना है। सबसे पहले 1988 में ऑस्ट्रेलिया ने इन्हें सर्कुलेशन में उतारा था। इसके बाद न्यूजीलैंड ने भी यही राह अपनाई, जबकि रोमानिया यूरोप का ऐसा पहला देश बना जिसने प्लास्टिक नोट जारी किए।

वर्तमान में रूस, चीन, कनाडा, सऊदी अरब, कुवैत और ताइवान जैसे देश भी अपने यहां पॉलिमर करेंसी का उपयोग करते हैं या इनका इस्तेमाल कर चुके हैं। भारत में इस सफल अंतरराष्ट्रीय मॉडल को अपनी वित्तीय व्यवस्था के अनुकूल परखने की तैयारी है।